जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३६ [ १ १५ १५० उनके साथ साढे बारह सौ भिक्षु हैं। उन भगवान् की इस प्रकार की कीर्ति है कि यह अरहंत हैं ...इस प्रकार नौ तरह¹ के गुण हैं, वह और उनके जन्म के समय से पूर्व निमित्त आदि भेद तथा भगवान् के प्रताप को प्रकाशित कर कहा कि देव ! उन भगवान् बुद्ध का संसर्ग करें, धर्म सुनें तथा शंकाएँ मिटाएँ। राजा का मनोरथ पूरा हुआ। वह बोला—सौम्य ! जीवक ! हाथियों को सजवाओ। हाथियो को सजवा वह राजसी ठाट-बाट से जीवक के आम्रवन में पहुँच राजा ने देखा सुगन्धित बडे भवन में तथागत भिक्षु संघ से घिरे बैठे है। जैसे महान् सरोवर हो, किन्तु उसकी लहरें शान्त हो, वैसे ही भिक्षु- संघ को इधर उधर से देखकर राजा ने सोचा—ऐसी शान्त परिषद् तो मैने इससे पहले कभी देखी ही नही। उसने भिक्षु-परिषद् के उठने-बैठने के तरीके से ही प्रसन्न हो संघ को प्रणाम किया। फिर संघ की स्तुति करते हुए उसने भगवान् को प्रणाम किया और एक ओर बैठकर श्रमणत्व के फल के बारे में प्रश्न किया। भगवान् ने उसे दो भाणवारो में विस्तार करके सामञ्जफल सूत्र² का उपदेश दिया। सूत्र का उपदेश हो चुकने पर वह प्रसन्न हो भगवान् से क्षमा माँग आसन से उठकर चला गया। राजा के चले जाने के थोडी ही देर बाद बुद्ध न भिक्षुओ को बुलाकर कहा— भिक्षुओ, यह राजा जख्मी होगया समझो। भिक्षुओ, राजा को आहत हो गया समझो। यदि यह ऐश्वर्य्य के लोभ मे पडकर अपने धार्मिक, धर्म से राज्य करने वाले पिता को जान से न मरवाता, तो इसे इसी आसन पर रज रहित, मल- रहित धर्म-चक्षु, उत्पन्न हो जाता। देवदत्त के कारण, दुष्ट को वडा स्थान देने से वह श्रोतापत्ति फल को न प्राप्त कर सका। किसी दूसरे दिन भिक्षुयो ने धर्म-सभा म बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! अजातशत्रु ने दुष्ट का आदर करके, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त की प्रेरणा से पितृ- ¹ इति पि सो भगवा¹, अरहं², सम्मासम्बुद्धो³, विज्जाचरणसम्पन्नो⁴, सुगतो⁵, लोकविदू⁶, अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि⁷, सत्था देवमनुस्सान⁸, बुद्धो भगवाति॥९ ² दीघ निकाय, (दूसरा सूत्र) ।