भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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सञ्जीव ] १३७ हत्या करके श्रोतापत्ति फल से हाथ धोया। देवदत्त ने राजा का नाश कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अभी अजातशत्रु दुष्ट का सम्मान करके विनाश को प्राप्त नहीं हुआ पहले भी इसने दुष्ट का आदर कर अपना नाश किया है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व महा सम्पत्तिशाली ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जाकर सब शिल्प सीख आए। फिर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हो पाँच सौ विद्यार्थियो को विद्या सिखाने लगे।

  • उन विद्यार्थियो मे एक सञ्जीव नाम का विद्यार्थी था। बोधिसत्त्व ने उसे मुर्दे को जिलाने का मन्त्र सिखाया। उसने मुर्दे को जिलाने का ही मन्त्र सीखा, फिर सुलाने का नही सीखा। एक दिन विद्यार्थियो के साथ जब वह लकडी बटोरने जगल गया तो उसने एक मृत-व्याघ्र को देखा। उसने अपने साथियो से कहा—मै इस मृत-व्याघ्र को जिलाऊँगा। विद्यार्थी—"नही जिला सकेगा।" सञ्जीवक—"तुम लोगो के देखते ही देखते जिलाऊँगा।" विद्यार्थी—"यदि जिला सकता है तो जिला।" इतना कहकर वे विद्यार्थी वृक्ष पर चढ गए। सञ्जीवक ने मन्त्र पढकर मृत- व्याघ्र पर ककर फेंके। व्याघ्र उठकर जल्दी से आया और सञ्जीवक का गला काट उसे मार स्वय भी वही गिर पडा। सञ्जीवक भी वही गिर पडा। दोनो एक ही स्थान पर मुर्दे हो गए। विद्यार्थियो ने लकडी ले आकर आचार्य्य को वह समाचार सुनाया। आचार्य्य ने विद्यार्थियो को बुलाकर कहा—तात ! दुष्ट को बडप्पन देनेवाले, जहाँ सम्मान नही करना चाहिए, वहाँ सम्मान प्रदर्शित करनेवाले इस प्रकार के दुख को अवश्य प्राप्त होते हैं। इतना कह यह गाथा कही— असन्तं यो पगण्हाति असन्तञ्चुपसेवति, तमेव घास कुरुते व्यग्घो सञ्जीविको यथा ॥