जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ [ १.१५ १५० शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना "भिक्षुओ ! मैंने केवल अभी इस दुष्ट लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का मेल बैठाया । उस समय दुष्ट कुमार यह लिच्छवि कुमार था। राजा आनन्द था। उपदेश देनेवाला तपस्वी मैं ही था । १५०. सञ्जीव जातक “असन्तं यो पग्गण्हाति ” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय अजातशत्रु राजा द्वारा किए गए दुर्गुणी के आदर के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उसने बुद्धो के विरोधी, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त के प्रति श्रद्धावान् हो, उस दुष्ट असत्पुरुष को ऊँचा स्थान दे उसका आदर करने की इच्छा से बहुत सा धन खर्च करके गया-सीस पर एक विहार बनवा दिया। उसी की बात मान अपने पिता को जो कि श्रोतापन्न आर्य-श्रावक था मरवा डाला । इस प्रकार अपने श्रोतापन्न होने की सम्भावना में बाधा डाल विनाश को प्राप्त हुआ। जब उसने सुना कि देवदत्त को जमीन निगल गई तो उसे डर हुआ कि कहीं उसे भी जमीन न निगल जाए। भयभीत होने से उसका राज्य-सुख जाता रहा। शय्या पर सोता तो उसे सोने में मजा न आता। तीव्र वेदना से पीडित हाथी के बच्चे के समान वह इधर उधर विचरता । उसे ऐसा दिखाई देने लगा जैसे पृथ्वी फट गई हो, उसमें से अवीचि-ज्वाला¹ निकल रही हो, और पृथ्वी ¹ अवीचि नरक से निकलने वाली ज्वाला ।