जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपण्ण ] १२६ वहां सदैव राज्य करवाते हुए रहनेवाले राजाओ की संख्या सात हजार सात सौ सात होती थी। उतने ही उपराजा होते थे। उतने ही सेनापति। उतने ही भण्डारी। उन राजकुमारो में एक कुमार दुष्ट लिच्छवि कुमार कहलाता था। वह क्रोधी था, प्रचण्ड था, कठोर था। डण्डे से छेड़े गए जहरीले सांप की तरह क्रोध से सदैव जलता रहता था। कोई भी उसके सामने दो तीन शब्द भी नहीं बोल सकता था। उसे न उसके माता पिता, न रिश्तेदार और न यार-दोस्त ही समझा सके। तब उसके माता पिता ने सोचा- "यह कुमार अत्यन्त कठोर स्वभाव का है दुस्साहसी है। सम्यक् सम्बुद्ध को छोड और कोई इसे विनयी नही बना सकता। हो सकता है कि यह उन्ही लोगो में से हो जो बुद्ध के विनीत बनाने से ही विनीत बनते है।" वे उसे शास्ता के पास ले गए और प्रणाम करके बोले- भन्ते ! यह कुमार प्रचण्ड है, कठोर है, क्रोध से जलता है। इसे उपदेश दे। शास्ता ने उस कुमार को उपदेश दिया- "कुमार ! प्राणियो के प्रति प्रचण्ड नही होना चाहिए, दुस्साहसी नही होना चाहिए, कष्ट देने वाला नही होना चाहिए। कठोर वाणी जिस माता ने जन्म दिया है उसको भी, पिता को भी, पुत्र को भी, भाई वहन को भी, भार्य्या को भी, मित्र बन्धुओ को भी अप्रिय होती है, अच्छी नही लगती। जो आदमी डसन के लिए आए सर्प की तरह, जगल म लूटमार करने के लिए तैयार चोर की तरह, खाने के लिए आए यक्ष की तरह उद्विग्न होता है, वह दूसरे जन्म म नरक आदि मे पैदा होता है। इस जन्म म क्रोधी आदमी सजा धजा रहन पर भी दुर्वर्ण ही होता है। इसका पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला भी चेहरा आग से जल कमल के सदृश अथवा मैले कञ्चन के शीशे की तरह भोंडा हो जाता है, देखने में बुरा लगता है। क्रोध के कारण ही प्राणी शस्त्र लेकर स्वयं अपने को मार डालते हैं। विष खा लेते हैं। रस्सी से फांसी लटक जाते है। प्रपात से गिर पडते हैं। इस प्रकार क्रोध के वशीभूत हो मरकर वह नरक आदि में पैदा होते हैं। दूसरो को कष्ट देनेवाले भी इस जन्म में निन्दा को प्राप्त हो मरन पर नरक आदि म उत्पन्न होते है। फिर जब मनुष्य होकर पैदा होते हैं तो फोडा फोड के ही रूपद से रुककर प्राय रोगी रहते हैं। आँख की बीमारी तथा कान की बीमारी आदि रोगो में एक से उठने पर दूसरी बीमारी में फँस ६