भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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४१६ [ २.६२३४ रार कहते हैं आरी को और रेरुव कहते हैं हाथीदांत को। जैसे आरी से कटा हुआ हाथीदांत फिर जुड़ नहीं सकता, फिर पहले की तरह से नहीं मिलता। इसी प्रकार मेरा तेरे साथ फिर चित्त का संयोग नहीं हो सकता। ——— यह कह उसने देखते हुए ही ऊपर उठकर दूसरी जगह चली गई। उसने उसके जाने पर रोते हुए दूसरी गाथा कही— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिलोभमदेन च, एव हायति अत्थम्हा अहंव असिताभुया ॥ [ जहाँ तहाँ इच्छा करने से, अति लोभ से तथा अति लोभमद से आदमी उसी प्रकार अपने लाभ को गँवा देता है जैसे मैंने असिताभू को।] ——— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिच्छा कहते हैं जहाँ तहाँ पैदा होने वाली असीम तृष्णा को। अतिलोभ कहते हैं सीमा लाँघने वाले लोभ को। अतिलोभमदेन च पुनः मद पैदा होने से अतिलोभ मद हो गया। भावार्थ यह है कि जहाँ तहाँ इच्छा करने वाला आदमी अतिलोभ से तथा अतिलोभमद से अहं व असिताभुया जैसे मैं असिताभू राजकन्या से जुदा हो गया वैसे वह अपने लाभ को गँवा देता है।