जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे पक्षी इधर न आयें। वह पक्षियो को उपदेश देती—राज-मार्ग बड़ा खतरनाक है। हाथी, घोड़े और मरकहे वैलोवाली गाडियां आती जाती है। शीघ्रता से उड़ा भी नही जा सकता। वहाँ नहीं जाना चाहिए। पक्षियो ने उसका नाम अनुशासिका रख दिया। एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती हुई गाड़ी के शब्द को सुन उसने पीछे मुंह कर देखा। 'अभी दूर है' सोच, चुगती ही रही। हवा के जोर से गाड़ी शीघ्र ही आ पहुँची। वह उड़ न सकी। पहिये से उसके दो टुकड़े हो गए। बोधिसत्त्व ने पक्षियो के लौटने पर उनकी गिनती करते समय उसे न देख कर कहा—अनुशासिका दिखाई नही देती, उसे खोजो। पक्षियो ने खोज करते हुए, उसे राजपथ पर दो टुकड़े हो पड़े देखा। बोधिसत्त्व से आकर निवेदन किया। 'वह दूसरो को जाने से रोकती थी लेकिन स्वयं वहाँ चुगने जाकर दो टुकड़े हुई' कह यह गाथा कही— यायञ्जमनुसासति सय लोलुप्पचारिणी, साय विपक्खिका सेति हता चक्केन साळिका ॥ [ जो दूसरो को उपदेश देती थी लेकिन स्वयं थी लोभी, वह यह चिड़िया पहिये के नीचे आकर पंख-रहित होकर मरी पड़ी है। ] यायञ्जमनुसासतीति, इसमें 'य' केवल दो पदो की सन्धि के कारण है। अर्थ है, जो दूसरो को उपदेश देती है। सय लोलुप्पचारिणी, अपने लोभी स्व- भाव वाली। साय विपक्खिका सेति, वह पंखरहित होकर राजपथ पर पड़ी है। हता चक्केन साळिका, गाड़ी के पहिये से मारी गई चिड़िया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय उप- देश देनेवाली चिड़िया यह उपदेश देनेवाली भिक्षुणी ही थी। ज्येष्ठ-पक्षी तो मैं ही था।