भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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३० [ १.१२ ११६ आचार्य उस समय बिलकुल मदहोश था। इसलिए उसने कहा—तू मेरी सामर्थ्य को नही जानता। इस प्रकार बोधिसत्व के उपदेश का अनादर कर, चार शक्तियो को लांघ पांचवी को लांघते समय डण्ठल से महुए के फूल के गिरने की तरह, चीखता हुआ गिरा; उसे देख बोधिसत्व ने कहा—यह पण्डितो का कहना न कर इस आपत्ति में पडा। इसके बाद यह गाथा कही— अतिकरमकराचरिय ! मय्हम्पेतं न रुच्चति, चतुत्थे लंघयित्वान पञ्चमियास्मि¹ आवुतो ॥ [ आचार्य, आज तुमने अति कर दी। मुझ तक को यह अच्छा नही लगा। चारो लांघकर पांचवी में गिर पडे । ] ———— अतिकरमकराचरिय, आचार्य, आज तुमने अति कर दी। अर्थात् अपनी शक्ति से बाहर काम किया। मय्हम्पेतं न रुच्चति, मुझ आपके शिष्य तक को यह अच्छा नही लगा। इसीलिए मैने पहले कह दिया था। चतुत्थे लंघयि- त्वान, चौथे शक्ति-फलक पर बिना गिरे लांघकर, पञ्चमियास्मि आवुतो, पण्डितो की बात न मानकर पांचवी शक्ति पर गिर पडे । ———— इतना कह आचार्य को शक्ति पर से उठा, जो करना उचित था, किया। शास्ता ने इस पूर्व-जन्म की कथा को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय का आचार्य, यह बात न माननेवाला भिक्षु था, शिष्य तो मैं ही था। ———— ¹ 'पञ्चमायसिं' भी पाठ है।