जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextतित्तिर ] ३१ ११७. तित्तिर जातक (२) "अच्चुग्गता अतिबलता "यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय कोकालिक¹ के बारे मे कही थी। क. वर्तमान कथा उसकी वर्तमान कथा तेरहवे निपात की तक्कारिय जातक² म प्रगट होगी। शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण नष्ट हुआ है, पहले भी नष्ट हुआ है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने उदीच्य ब्राह्मण कुल म जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर तक्षशिला जा सब विद्याएँ सीखीं। फिर काम-भोग के जीवन को छोड़ ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो को प्राप्त किया । हिमवन्त प्रदेश के सभी ऋषियो ने उन्ह अपना उपदेशक आचार्य बनाया और उनके आस-पास रहने लगे। वे भी पाँच सौ ऋषियो के उपदेशक-आचार्य बन ध्यान मग्न हो हिमवन्त मे रहते थे । उस समय पाण्डु रोग से पीडित एक तपस्वी कुल्हाडी लेकर लकडियाँ फाड रहा था। उसके पास बैठे एक वाचाल तपस्वी ने 'यहाँ पर मारें, यहाँ पर मारें' बार बार कहकर उस तपस्वी को क्रोधित कर दिया। उसने क्रोध ¹ कोकालिक देवदत्त के पक्ष का एक सघ-भेदक था। ² तक्कारिय जातक (४८१)