भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३२ [ १.१२.११७ में आकर कहा, 'तू मुझे अब लकडी चीरना सिखाना चाहता है', और अपनी तेज कुल्हाड़ी उठा उसे एक ही प्रहार से मार डाला। बोधिसत्व ने उसका शरीर-कृत्य किया। उसी समय आश्रम से कुछ ही दूर वल्मीक पर एक तित्तिर रहता था। यह सुबह शाम वल्मी के ऊपर खड़ा हो बडे जोर से आवाज लगाता। उसे सुन एक शिकारी ने सोचा कि तित्तिर होगा और शब्द के पीछे पीछे जा, उसे मार घर ले गया। बोधिसत्व ने उसकी आवाज न सुनाई देती देख तपस्वियों से पूछा- उस जगह एक तित्तिर रहता था। उसकी आवाज नहीं सुनाई देती ? उन्होंने बोधिसत्त्व को सब हाल कहा। बोधिसत्त्व ने ऊपर की दोनों बातों को मिला ऋषियों के सामने यह गाथा कही— अच्चुग्गता अतिबलता अतिवेलं पभासिता, वाचा हनति दुम्मेधं तित्तिरं वातिवस्सितं ॥ [ अति-ऊँची, अति जोर से अत्यधिक देर तक बोली गई वाणी मूर्ख आदमी को वैसे ही मार डालती है जैसे जोर से चिल्लाने से तित्तिर मारा गया।] अच्चुग्गता, अति उद्गता। अतिबलता, बार बार बोलने से बहुत बलशाली हो गई। अतिवेलं पभासिता उचित से बहुत ज्यादा देर तक भाषित। तित्तिरं वातिवस्सितं, जैसे बहुत बोलने से तित्तिर मारा गया, वैसे ही इस प्रकार की वाणी मूर्ख आदमी को मार गिराती है। इस प्रकार बोधिसत्त्व ऋषियों को उपदेश दे चारो ब्रह्म-विहारों की भावना कर ब्रह्म-लोक गामी हुए। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण विनष्ट हुआ, किन्तु पहले भी नष्ट हुआ' कहा, और यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दुर्वचन बोलनेवाला तपस्वी कोकालिक हुआ। ऋषिगण बुद्ध-परिषद। और ऋषिगण का शास्ता तो मैं था ही।

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