भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

५४ [ १।२।१८

आगे के दांत निकालकर मुस्कराई। श्रेष्ठिपुत्र ने देखा, तो दांतो की हड्डियां उसके लिए ध्यान का विषय हो गईं। उसमें अस्थि-सञ्ज्ञा पैदा हुई। उसे वह सारा शरीर हड्डियों के पञ्जर की तरह मालूम देने लगा। उसकी मजदूरी दे, उसने कहा 'जाओ'। उसने घर से निकलने पर बीच-बाजार में खड़ा देख एक ऐश्वर्यशाली आदमी उसे खर्चा दे अपने घर ले गया। सप्ताह बीतने पर उत्सव समाप्त हुआ। वेश्या की माता ने जब देखा कि लडकी नहीं आई तो वह श्रेष्ठिपुत्रों के पास गई और पूछा कि वह कहाँ है? उन्होने उत्तर श्रेष्ठिपुत्र के यहाँ जाकर पूछा कि वह कहाँ है। उसने कहा "उसी समय खर्चा देकर विदा कर दिया।" उसकी माँ रोने लगी। 'मैं अपनी लडकी को नहीं देखती। मेरी लडकी लाओ' कहते हुए वह उत्तर-श्रेष्ठि-पुत्र को ले राजा के पास गई। राजा ने मुकद्दमे का फैसला करते हुए पूछा- "इन श्रेष्ठिपुत्रों ने तुम्हे वेश्या लाकर दी ?" "देव ! हाँ।" "अब वह कहाँ है ?" "नहीं जानता हूँ। उसी समय उसे विदा कर दिया था।" "अब उसे लिया आ सकता है ?" "देव ! नहीं सकता हूँ।" "यदि नहीं ला सकता है, तो इसे राज-दण्ड दो।" उसके हाथ पीछे की तरफ बाँध राज-दण्ड देने के लिए उसे पकडकर ले गए। वेश्या को न ला सकने के कारण राजा श्रेष्ठिपुत्र को राज-दण्ड दे रहा है, सुन सारे नगर मे हल्ला मच गया। लोग छाती पर हाथ रखकर 'स्वामी ! यह क्या आपके योग्य है ?' कहते हुए रोने लगे। सेठ भी रोता पीटता पुत्र के पीछे पीछे जा रहा था। श्रेष्ठिपुत्र सोचने लगा, 'यह जो मुझे इस प्रकार का दुख हुआ, यह घर में रहन के ही कारण हुआ, यदि मैं इससे मुक्त हुआ तो गोतम सम्यक सम्बुद्ध के पास प्रब्रजित होऊँगा।' वेश्या ने हल्ला सुना तो पूछा यह क्या हल्ला है? समाचार मालूम होने पर वह जल्दी से उतर "स्वामी ! हटो हटो" मुझे राज पुरुषो को देखने दें कहती हुई राज-पुरुषो के पास पहुँची। राज-पुरुषो ने उसे देख माता को सौंपा