जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला परिच्छेद १४. असम्पदान वर्ग १३१. असम्पदान जातक "असम्पदानेनितरीतस्स..." यह (गाथा) शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय भिक्षु धर्मसभा में बैठे बातचीत कर रहे थे—आयुष्मानो ! देवदत्त अकृतज्ञ है। तथागत के सद्गुणो को नही जानता। शास्ता न आकर पूछा— "भिक्षुओ ! अब बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, देवदत्त केवल अभी अकृतज्ञ नहीं है, पहले भी अकृतज्ञ ही रहा है।" —इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे मगधदेश के राजगृह नगर में किसी मगधनरेश के राज्य करते समय बोधिसत्त्व उस (राजा) के ही सेठ थे। उनके पास अस्सी करोड धन था। नाम था सङ्घसेठ। वाराणसी मे भी पिल्लिय सेठ नामक सेठ था। उसके पास भी अस्सी करोड धन था। वे दोनो परस्पर मित्र थे। उनमें से वाराणसी के पिल्लिय सेठ को किसी कारण से कोई खतरा आ पडा। तमाम जायदाद नष्ट हो गई। वह दरिद्र हो गया। आश्रयरहित