ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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अधिक बढ़ी नहीं है। पहले पहल यह प्रेम जाति तक सीमित रहा। ये सब देवता केवल अपने सम्प्रदाय मात्र से प्रेम करते थे। प्रत्येक देवता एक जातीय देवमात्र था, केवल उसी जाति-विशेष का रक्षक मात्र था। और जिस प्रकार भिन्न भिन्न देशों के विभिन्न वंशीय लोग अपने को उस एक विशेष पुरुष का वंशज कहते हैं जो उस वंश के प्रतिष्ठाता होते हैं, उसी प्रकार कभी कभी किसी जाति के लोग अपने के एक देवता का वंशधर समझते थे। प्राचीन काल में अनेक जातियाँ थीं और आज भी हैं जो अपने को चन्द्रवंशी या सूर्यवंशी कहती हैं। संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थो मे आपने बड़े बड़े सूर्यवंशी वीर सम्राटो की कथाये पढ़ी होगी। ये लोग पहले चन्द्र-सूर्य के उपासक थे; बाद मे ये अपने को चन्द्र और सूर्य का वंशज कहने लगे। अतः जब यह जातीय भाव आने लगा तब किंचित् प्रेम जागा, परस्पर एक दूसरे के प्रति एक कर्त्तव्य-भाव भी आया और कुछ सामाजिक शृंखला की उत्पत्ति हुई; और इसी के साथ साथ यह भावना भी आने लगी कि हम एक दूसरे का दोष सहन या क्षमा बिना किये कैसे एक साथ रह सकेगे ? मनुष्य किस प्रकार अन्ततः कभी न कभी अपनी प्रवृत्तियो का बिना संयम किये दूसरो के साथ, यहाँ तक कि एक व्यक्ति के साथ भी रह सकता है ? यह असम्भव है। इसी प्रकार संयम की भावना आयी। इसी सयम की भावना में सम्पूर्ण समाज गुँथा हुआ है, और हम जानते हैं कि जो नर-नारी इस सहिष्णुता या क्षमा रूपी शिक्षा से रहित हैं वे अत्यन्त कष्ट में जीवन बिता रहे हैं।
अतएव जब इस प्रकार धर्म का भाव आया तब मनुष्य के मन मे एक उच्चतर अपेक्षाकृत अधिक, नीतिसंगत भाव का आभास -