ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६. माया और मुक्ति
कवि कहते हैं कि “हम जिस समय जगत् में प्रवेश करते हैं उस समय अपने पीछे मानों एक हिरण्मय मेघजाल लेकर प्रवेश करते हैं।” किन्तु यदि सच पूछो तो हम मे से सभी इस प्रकार महिमामण्डित होकर संसार मे प्रवेश नहीं करते; हममें से बहुत से तो कुज्झटिका (कुहरे) की कालिमा अपने पीछे लेकर जगत् मे प्रवेश करते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हम लोग, हममें से सभी मानों युद्ध करने के लिये युद्धक्षेत्र मे प्रेरित कर दिये गये हैं। रोते रोते हमे इस जगत् मे प्रवेश करना होगा—यथासाध्य चेष्टा करके अपना मार्ग बनाना होगा—इस अनन्त जीवन-समुद्र में पीछे की ओर कोई चिन्ह तक न छोडकर मार्ग बनाना होगा—सम्मुख की ओर हम अग्रसर हो रहे है, पीछे अनन्त युग पड़े हैं, और सामने भी अनन्त युग पड़े हैं। इसी प्रकार हम चलते रहते है और अन्त मे मृत्यु आकर हमें इस क्षेत्र से अपसारित कर देती है—विजयी अथवा पराजित कुछ भी निश्चित नहीं है; यही माया है।
बालक के हृदय की आशा बलवती होती है। बालकों के विस्फारित नयनों के समक्ष समस्त जगत् मानों एक सुनहले चित्र के समान मालूम पडता है; वह समझता है कि मेरी जो इच्छा होगी वही होगा। किन्तु जैसे ही वह आगे बढ़ता है वैसे ही प्रत्येक पद पर प्रकृति वज्रदृढ प्राचीर के रूप मे उसका गतिरोध करके खड़ी हो