भारतकोश
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 289

आत्मा का मुक्त स्वभाव

२८५

सभो का वर्णन अधिक नही है। वह एक ऐसी भाषा मे लिखा गया है जो अत्यन्त सक्षिप्त है और सरलता से याद रखी जा सकती है।

प्रतीत ऐसा होता है कि इस ग्रन्थ के लेखक मानो केवल कई घटनाओ को स्मरण रखने के उपाय लिख रहे है। मानो उनकी ऐसी धारणा है कि ये सब बाते सभी जानते है। इससे असुविधा यह होती है कि हम उपनिषद् मे लिखी कथाओ के वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण नहीं कर सकते। इसका कारण यह है-यह सब जिन लोगो के समय मे लिखा गया था वे लोग उन घटनाओ को जानते थे, किन्तु आज उनकी किम्बदन्ती भी वर्तमान नही है,-और जो एकाध है भी, वह भो अतिरंजित होगई है। उनकी ऐसी नयी व्याख्या होगई है कि जब हम पुराणो मे उनके विवरण पढ़ते है तो देखते है कि वे उच्छ्वासात्मक काव्य बन गये है।

पाश्चात्य देशो मे जैसे हम पाश्चात्य जाति की राजनीतिक उन्नति के विषय मे एक विशेष भाव देख पाते है कि वे किसी प्रकार अनियन्त्रित शासन सहन नही कर सकते, वे किसी प्रकार के बन्धन को-जैसे कोई उनके ऊपर शासन करे-सहन नही कर सकते, वे जैसे क्रमशः उच्च से उच्चतर प्रजातन्त्र-शासन-प्रणाली की उच्च उच्चतर धारणा तथा बाह्य स्वाधीनता की उच्च से उच्चतर धारणा प्राप्त कर रहे हैं ठीक वैसी ही घटना दर्शन मे घटती है; किन्तु भेद यही है कि यह आध्यात्मिक जीवन की स्वाधीनता है। 'अनेक-देववाद' से क्रमशः लोग 'एकेश्वरवाद' मे पहुँचते है-उपनिषद मे फिर मानो इसी एकेश्वरवाद के विरुद्ध युद्धघोषणा हुई है। जगत