कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीतः ।
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सचछोक सुख अभूतस्नानी । एके संग रहब दोह प्राणी ॥ तुम्हरे वंश होइहे रांडी । कंथ बेसुख धगडन सो मांडी ॥ मैं पतिव्रता सटुरुके चेली । आप देऊं तो साथ मत हेली ॥ एक कहाँ सो सब सुन राखो । प्रातीह नारद सुख नाम भाषो ॥ नारद कोप कीन्ह परनामा । मोपर कोप न कीजे बाया ॥ जाकर स्वामी भर जग जाई । सुनतहीं रोर करे चिल्लाई ॥ कुंभर बध कहे सुन कपि सुर्षा । रोष जिये तो मरे न पुरुषा ॥ मरे सोइ जो गुरु नहीं कीन्हा । हमरे शिरपर सपर्य चीन्हा ॥ जेते दिना लिखा एक संग । वोही जोत मई धसत पतंगा ॥ ऐसी संगत हमरे पाई । अस सोइ करे ज्ञान जेहि याडे ॥ कैसी संगत तुम्हरी बाला । जसपनिहारिन कलशभरि चाला ॥ दस घरकी तब एकहिं ठाई । कलश भारि २ लीन्ह उठाई ॥ घाट पंथ जित तित भई नारी । ऐसी संगत कृषी हमारी ॥ ऐसी समय कुंभर चलि आये । नारद सुख देख कारिख आये ॥ कुंभर उतर कीन्हे प्रणामा । परम गुरु पितृ मात द्विज रामा ॥ नारद कुंभरसो विनती लाई । हम यह दरश एक बात जनाई ॥ मिथ्या वचन कहा हम आई । तुम्हरे सुयेकी खबर जनाई ॥ कोइ तोह लाग रोवे नहीं भाई । तुव मृतु सुन सबगती कराई ॥ कहैं कुंभर रोवे किहि काहीं । जो रोवे भरना पुनि ताही ॥ सुये कारण नहीं रोइये स्वामी । तब मृत्युका गाडे प्राणी ॥ सुये चलावा मंगल गाई । गुरु साधुकी सेवा लाई ॥ अन्नदान कंचन दिज जाना । मृतुका पहुंचे गुरु निज धामा ॥
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