कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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कवीरवचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।
देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥
जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥
जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥
छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥
आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥
कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥
शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥
सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥
मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥
क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥
कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥
रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥
सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥
प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥
सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥
जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥
भगवानोवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥
सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥
एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥