भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

७३

कवीरवचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।

देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥

जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥

जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥

छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥

आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥

कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥

शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥

सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥

मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥

क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥

कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥

रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥

सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥

प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥

सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥

जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥

भगवानोवचन ।

कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥

सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥

एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥