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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages
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सत्यनाम.

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कवीर, सुरतियोगसंतायन, धनीधर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शननाम, कुलपतिनाम, प्रमोधगुरुवालापीर, कवलनाम, अमालनाम, सुरतिसनेहीनाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रगटनाम, धीरजननाम, उग्रनामसाहवकी दया वंश बयालीसकी दया ।

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सत्यनाम.

गुरुस्तुति ।

श्लोकाः ।

हे लोकेश दयानिधे ! त्रिभुवने देवोऽस्ति करत्त्वत्परः । ब्रह्माविष्णुमहेश्वरैः सुरगणैः संसेव्यमानः सदा ॥

संसारारुध्यद्वानलेन विकलः संतप्यमानोऽस्म्यहम् ।

त्वत्पादौ शरणं गतोऽद्यदिवसे भोः सद्गुरो ! पाहि माम् १

अर्थ—हे विश्वपति दयासागर ! त्रिलोकमें आपसे कौन देवता श्रेष्ठ है ? अर्थात् कोई नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव इत्यादि देवताओंके समूहकरके आप सदाकाल सेवन करने योग्य हो. संसाररूपी दावांभ्रसे व्याकुल हुआ तपायमान मैं आज आपकी शरणागतिको प्राप्त होता हूँ सो हे सद्गुरु ! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥

ध्येयं सदा निखिलवेदविदो वदन्ति ।

ज्ञेयं च शुद्धमतयो यतयो विरक्ताः ॥

स त्वं प्रभो ! विगतशोकभवाब्धिसेतो ! ।

प्रत्यक्षतोऽसि भवतः शरणागतोऽस्मि ॥ २ ॥

आपको समस्त वेदके विद्वान् ध्यान करने योग्य कहते हैं, तथा विरागवान् निर्मल बुद्धिवाले यतिलोग आपको जानने योग्य कहते हैं सो आप हे प्रभो ! शोकरहित संसारके सेवु हो. मैं आज आपके साक्षात् शरणागत होता हूँ ॥ २ ॥

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१२

गुरुस्तुति.

नमोऽस्तु ते नाथ ! तवांश्रिपंकजम् ।

प्रत्यग्रकल्पदुमपर्णसन्निभम् ॥

श्रेयस्कंरं स्वात्मपदप्रदायकम् ।

ध्येयं सुनीन्द्रैरपि योगिनां वरैः ॥ ३ ॥

हे नाथ ! आपके चरणारविंदोंको नमस्कार है. कैसे हैं आपके चरणारविन्द कि, कल्पवृक्षके नूतन पत्रोंके समान, कल्याणके करनेवाले तथा स्वात्मपदको प्राप्त करानेवाले फिर कैसे हैं ? सुनीन्द्र और योगीन्द्रोंके भी ध्यान करने योग्य ॥ ३ ॥

माता त्वमेव भव नाथ ! पिता त्वमेव ।

सौहार्ददः स्वजनवन्धुसखा त्वमेव ॥

सर्वं त्वमेव न च कोऽपि त्वया विनाऽन्यः ।

तस्मात्त्वदीयचरणौ शरणागतोऽस्मि ॥ ४ ॥

हे मेरे नाथ ! आपही माता हैं, आपही पिता हैं, आपही मित्र हैं, आपही कुटुम्बी हैं, आपही भाई हैं, आपही सखा हैं, आपही सब कुछ हैं, आपके विना मेरा और कोई नहीं है. तिसी कारणसे मैं आपके चरणोंकी शरणागति हुआ हूँ ॥ ४ ॥

अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽस्मि दयानिधे ! ।

नरः संसारदुःखोघात्त्वप्रसादाद्विमुच्यते ॥ ५ ॥

हे दयानिधे ! मुझे प्रतीत होता है कि, आज मेरा जन्म सफल हुआ है. क्योंकि, मनुष्य दुःखके समूहसे आपहीकी कृपासे मुक्त होते हैं ॥ ५ ॥

श्लोकपंचकमाहात्म्य ।

यः श्लोकपञ्चकमिदं पठते सुभवत्या ।

शिष्यो जहाति कुर्गाति परितः सदा तम् ॥

संपद्यते विविधमंगलहर्षलाभम् ।

सर्वार्थसिद्धिरपि मोक्षगुरोः प्रसादात् ॥ ६ ॥

धर्मराजकी सभा

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अथ

कबीरकृष्णगीताप्रारम्भः ॥

उक्ति विष्णुव्यासवाणी—चौपाई ।

सुमिरो सचनाम गुरु नामा । साधुस्वरूप गुरु विसराया ॥ वक्ता विष्णु व्यास श्रुति वाणी । गुरुप्रताप सकलो गम जानी ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश देवादी । तैत्तिस कोट देव संवादी ॥ सुनि नारद इंद्रादि अहीशा । सरस्वती गणपति जगदीशा ॥ बैठे सबै विष्णु मुख हेरा । पापपुण्यका करहिं निवेरा ॥ चित्रगुप्त तहां कागज लिखहीं । जेहिपर जेते बाकी अहहीं ॥ कितहुं निरति भजन गुरुनामा । कितहुं तो माया मनकामा ॥ पाप पुण्य बंधन जमफांसी । नाम विना भरमें चौरासी ॥ पकडे जीव चोरकी नाई । मारत सुगदर रोर कराई ॥ सासत खाय जीव अपराधी । यम लावे साकट कहैं बांधी ॥ करे पुकार सुने नहीं कोई । गुरुविन साकट परले होई ॥ जीवधात आमिष भस् जेते । अग्निकुंडमें झरकें तेते ॥ अग्नि जारके नरक बुडावे । नरकभर सिर निकसन आवे ॥ जब जिव सीस काठ दम लेहीं । तवहीं जम सिर सुगदर देहीं ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

लोहा सरा सा सिसखेधके गाडे । पिबहिं नरक जिव परवश पाडे ॥ त्रिगुण भक्त जिव तजे न काला । त्रिगुणभक्त काल भगजाला ॥ परनारी परद्व्य तलासी । तेहिंते ढारि दैय गरव फांसी ॥ ओझा डाइन चोर वटपारा । परे नरक जो खेले शिकारा ॥ साधु देख जिन बदन छिपावा । जम सिर सुगदर ताहि ढहावा ॥ मिथ्या वाद चुगल हंकारी । मित्र द्रोह ले नरकहिं डारी ॥ कृणबंधन निज आतमघाती । बंधुघात जम तोरैं छाती ॥ विश्वासघात दै लेय बहोरी । अघोर नरकमें तेहिं ले बोरी ॥ बैरागी ब्राह्मण संन्यासी । शस्त्र वांध भ्रमैं चौरासी ॥ गुरु पितु मातुकी करे नहिं सेवा । भ्रमैं तीरथ पूजत बहु देवा ॥ ब्रह्म तजि जो पूजहिं भूता । अघोर नरक देहीं जमदूता ॥ आतम तज जा पूज पषाणा । शिलाखूप देहीं भगवाना ॥ बृद्ध मनुज जो करहिं विवाही । सूकर जन्म नरक भार वाही ॥ वेश्यागमन विश्वाकर बेटा । तेहि पीछे होय ब्राह्मको घेटा ॥ त्रिया पाते तज जार जो राती । लोहमेश जम तोरहिं छाती ॥ तेहिपर आनि अग्नि धधकावैं । छेद बेध जम अनल जरवैं ॥ मात पिता तज त्रिय प्रतिपालैं । ताहि काल आवामैं डालैं ॥ बापको कुल तज जो सासुर वसैं । ताके सिर भसान चढ हसैं ॥ बहिनी गांव वसे जो प्राणी । पितृपछ त्याग संग्रह अवखानी ॥ अजिया सुत जिन बंधोर भाई । अजिया फिर तेहि खाय चवाई ॥ दिन दस भक्त करें अज्ञानी । बहुर मलेश दशा लपटानी ॥

सत्यनामकी महिमा

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कवीरकृष्णगीता ।

ताहि दिखे भिक्षाके कुंडा । उठ बुडके अब काटै सुंडा ॥ निकसत सिर जम मार गजारा । लोहदंत क्रम करहिं अहारा ॥ देह पशया भषे जो मासू । भषहीं क्रम दंतन घट तासू ॥ बरबस व्याह छोर धन लेहीं । ताहि सेज कांटाको देहीं ॥ जिन भिक्षारिको भीख न दीन्हा । ताकहैं भीख मंगाय लीन्हा ॥ गांगत भीख देय जो गारी । कहहिं ते भीख न देय अनारी ॥ अभ्यागतको नेवति जेवावे । तोहेते पाय चला अघ जावे ॥ पारहि वाट टाट दै मारी । मार शिकार कोरटिया अघ डारी ॥ करे मजूर मजुरी भूखा । पेट भरे लघु जेठके सूखा ॥ जो हरे मजूरनकर मजुरी । ताकहैं काल देत हैं सूरी ॥ गऊ बधन जो द्विज बध कीन्हा । विष्णुबोह खान अब दीन्हा ॥ दुरबल सबल सबल नर चांपै । जम बेधे तब थरथर कांपै ॥ जौलो पोखर पार बनावे । जड आगे हत जीव चढावे ॥ देव नाम ले जीव हतावे । भोथे शस्त्रसे गला रितावे ॥ ब्राह्मण करे शूद्रसो भोग । परे नरक व्यापे बहु सोगा ॥ कन्या वेंच वेंच करे व्याजा । औ जो महँग मनावे अनाजा ॥ इन सबको दीन्हा अघखानी । औ जो प्यासे देय न पानी ॥ राजा होय अन्याई होई । परजहि दुखदे अघ भुगते सोई ॥

दोहा—जन्म जन्मका लेखा, वासिल बाकी होय ।

पापी दुख सिर बूडही, पुत्रिहि पहुँचे सोय ॥

जाहि जीव जत पुत्रके दासा । सो वैकुंठ पुत्र भर बासा ॥ पुत्र घटा फिर पर चौरासी । सत्तनाम मिन कटे न फांसी ॥

राजा छत्रजीतकी कथा

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कबीरकृष्णगीता ।

मन वचके जो साधू सेवा । ताकहैं छोड़ि सके न जमदेवा ॥ साधु देह घर भजहिं जो रामा । सदुरु भाकि प्रताप सुखधामा ॥ सुखके धाम आह सतलोक । सतनाम भज जीव निसोका ॥

राजा छत्रजीतकी कथा ।

राजा छत्रजीत छत्रधारी । करे भाकि कुल लाज बिसारी ॥ इच्छाभोजन सब कहैं देई । जो इच्छा माँगे सो लेई ॥ राजा रहे कबीरके शीषा । सर्व जीवपर दाया दीषा ॥ आतुर होय कहे इंद्र भुवारा । अब तो राज न रहे हमारा ॥ राजा छत्रजीत चलि आवा । इच्छा भोजन सबहिं खवावा ॥ बोले कृष्ण इंद्रसन आई । कबीर भजेते प्राण बसाई ॥ इन्द्र उवाच ।

कहैं इंद्र अब केहिपर जाऊँ । हम आये राखहु मम भाऊ ॥

कृष्ण उवाच ।

जो अब तुव आवनमें राखो । निर्गुण भक्त दोह किष भाषो ॥ जो हम निर्गुण भक्त दुखावैं । निराकार मोहि नरक डुबावैं ॥ और सबनपर मैं सरदारा । कबीरके संतसे जम सब हारा ॥ कबीरको मनुषजानो मत कोई । कारण करण कबीर है सोई ॥ निराकार निरंजन देवा । तिन कह सत्त कबीरको भेवा ॥ पिता निरंजन हम सो कहेऊ । जब कबीर तब कोई नहीं रहेऊ ॥ कहैं निरंजन राज जो मोरा । सो दीन्ह कबीर बंदीछोरा ॥ कबीरके दिये करें हम राजू । कबीर भेवक मम सिरताजू ॥

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कबीरकृष्णगीत ।

और सबे हैं जमके चेरा । भजें कबीर तेहि सतपुर डेरा ॥ कहैं कृष्ण जानहु सो करहु । कबीर बालकके पाछन परहु ॥ कृष्णबचन लख सबहिं उदासा । कहैं अजहूँ चल देखहु दासा ॥ ब्रह्मा रुद्र नारद सब देवा । रज तम संग जीव सबे चलेवा ॥ इंद्र आद नारद सो भाषी । चलो जाय देखहुँ मैं आंखी ॥ सबे अधर धर प्रगटे गोपा । नारद धार नृप गये कोपा ॥ सात दिवस निशिके हम भूखे । इच्छाभोजन विन हम खूखे ॥ जाय सेवटिया नृप सो कहई । क्षुधावंत द्वारे नृप अहई ॥ राजा कहा पूछहु तुम जाई । इच्छा भोजन कौन गोसाई ॥ जाय सेवटिया ऋषिसों पूछा । भोजन कौन आय तुव इच्छा ॥ तव नारद कहै तोहि कह कहहीं । कहौ ताहि राजा जो अहई ॥ जाय सेवटिया नृपसो भाषी । द्विज नृपसो कहवे चित राखी ॥ राजा आय कीन्ह परणामा । कछु ऋषि कहु इच्छा भच्छकामा नारद कहैं इच्छा चित मोरा । सर्व मांस खाऊं भर थोरा ॥ सर्व मांस सुन राजा डरेऊ । सर्व जीव हतको डर भरेऊ ॥ नृप ऋषिकहैं बैठक दीन्हा । आप गमन भवन निज कीन्हा ॥ मंदिर जाय ध्यान गुरु कीन्हा । तुरत कबीर दरश नृप दीन्हा ॥ राजा चरण पखार सो पान कराये । नारद सुनिके कथा सुनाये ॥ सर्व मांस चाहे अन्याई । सट्टरु आप दया डर लाई ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सोच कछु नाहीं । देहु मीन ले तिनके पाहीं ॥ सर्व मांस है मीनशरीरा । गउ सूकर नर सकल सधीरा ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

भिक्षा पटार और खरचारा । भवै मीन सो सूतक झारा ॥ मीन कीरा सो तुरत मगाये । शूद्र हाथ दे राय पठाये ॥ नारद देख कोप होय ऊठे । लेहिं न मीन जाय तब रुठे ॥ जाय दास नृप सो अथाई । ब्राह्मण रुठा जाय गोसाई ॥ उठे कबीर राय तेहि बारा । आय ठाढ़ भै सिंह दुवारा ॥ आपन रूप छिपाय कबीरा । साधुरूप होय मुनिसो भीरा ॥ कहै साधु सुन जपके अंसा । सर्व मांस तैं भष निहंससा ॥ नारद कहै जीवन जिव मारी । सबकर मांस मैं भषत अहारी ॥ कहै कबीर राजासों वाणी । कलिके विष जाय अघखानी ॥ अब नृप मालुष बहुत बोलावहु । तिनते सब तर रुधिर मंगावहु ॥ जीवन मरे रुधिर सब चाही । सप सरोय अब सबके लाही ॥ एक कहत धाये शत कोटी । लाये हेर रुधिर भर लोटी ॥ सो ले धरा ऋषीके आगे । सर्व मांस अब लेहु अभागे ॥ लोहूते होय मांस तुच हाडा । सर्व मांस भषतैं अब गाढा ॥ नारद देख अचंभा भयऊ । हो नृप यह बुध को तोहि दियऊ ॥ कहा नृप सतनाम कबीरा । सो हमरे रक्षक गुरुपरा ॥ सो समर्थ मम सङ्कट निवारन । औ सब जीवके विथा विडारन ॥ तब कबीर निज रूप दिखावा । नारद प्रतीत भये पतिआवा ॥ नारद सुनहु श्रवण दे वैना । कहै कबीर अलख लख नेना ॥ कस तुम फंद रच्यो इहँ आई । भेटो अजहूँ सबै नसई ॥ डोप तोहे नरक लै नारद । राख सके को गनपत शारद ॥ नारद बेग नृपके पग धारे । राजा बकसहु चूक हमारे ॥

नारद-कृष्ण संवाद व कबीरके भक्तकी महिमा

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कवीरकृष्णगीता ।

तब राजा कबीर मुख जोवा । कहैं कबीर वकसहु द्विज रोवा ॥ राजा कहे वकसाहम तोहौं । तुमहु दया कर वकसहु मोहीं ॥ तब नारद बहु स्तुति कीन्हा । सबै रुधिर सरवरमह दीन्हा ॥ जेहि २ तनके ओनित गहेऊ । भयउ सोझकतनमीनहोय रहेऊ ॥ स्तुति करत नारद चलि गयऊ । अति लज्जित होय हरिपद गहेऊ ॥ हीरसन्मुख नारद सिर नाये । पूछा हरि कृषि कहैंते आये ॥ नारद उवाच ।

कहे कृषि नारद सुन जदुराई । विन तुव आज्ञा गयउ गोसाईं ॥ इंद्रकाज ब्रह्मा शिव भेजा । भयऊँ पतित अब यह तन तेजा ॥ छत्रजीतके गुरु कबीरा । रोसेउ तिन पुनि नृपत गैभीरा ॥ भसभ होत चाहूं वहां आजू । होत भला तब इंद्रके काजू ॥ सत कबीर मोहि कोप सुनावा । भम सेवक किमि आन दुखावा ॥ अभित कला कजु वराणि न जाई । कहीं न सके अज हरि देव नसाई ॥

कृष्ण उवाच ।

कहे कृष्ण तुम हमरी नहिं भाना । मानसके तुम सहुर जाना ॥ सतकबीर करता आविनाशी । निराकारके मूलकबीर मुखराशी ॥ राजा रहे कबीरके दासा । तिनसे हम आज्ञा प्रगासा ॥ कबीरके संतसे काल डेराना । जरे गात तब पेल पराना ॥ कबीरके संत रहे सतलोक । इंद्रहि कौन भार भौ सोका ॥ जब इंद्र तब इंद्र कह पूजहु । इंद्र परहि अब दूसर भूजहु ॥ इंद्रासन वैकुंठ विलासा । यह सब क्रीतम ठोर विनासा ॥ सत्तलोक अम्बरपुर देश । तहां रहे सतकबीर मुखभेषा ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

सबहिं जीव सतकबीरके आहीं । विन परचे कोइ चीन्हत नाही ॥ मैं चीन्हा मोहि पिता चिन्हावा । निराकार मोहि भेद बतावा ॥ तुम सब कहैं हम भाष सुनाई । पेल वचन तुम गये गोसाई ॥ कबीरके त्रास निरंजन कंपे । हम तेहि दास गने निज आपे ॥ धर्मराय चौदह तेहि हारे । जो सतनाम कबीर पुकारे ॥ सुन नारद सीस तर कीन्हा । कबीरके स्तुति करवे लीन्हा ॥ पुनि एक जम दौरा तहैं आवा । विष्णुहिं सीस नाग गोहरावा ॥ जीव एक बरबस चलि जाई । सत् कबीर कहैं इतराई ॥ तेहि देखत मम बल भोथोरा । जैसे साहु देखत हो चोरा ॥ तुम हरि सब ईश गोसाई । ताते आप कहों गोहराई ॥ कहा विष्णु तुम घर चलि जाहू । जो कबीर बै मुख तेहि खाहू ॥ हम सब हैं कबीरके दासा । निराकारको जाकी आसा ॥ सत्पुरुष सतनाम कबीरा । दास कबीरके सो मतधीरा ॥ कहैं कृष्ण सुन जम जिवजाळा । तजहु जाहि तेहि तुलसीमाला ॥ तुलसीमाला तिलक लिलारा । कहैं कबीर जिन राम पुकारा ॥ तासु निकट जिन जायहु भाई । साकट बांध नरक देवनाई ॥ भये शिष्य गुरु शब्द न माने । गुरुसाधनकी भाकि न ठाने ॥ साकटके तेहि लागे चांपी । साकट तो भये कालसभीपी ॥ विन गुरु शरणको साकटकहिंये । विन गुरु शरण वस अव लहिंये ॥

दोहा-सत् कबीरके सेवक, तेहि मत बोलहु बात ॥ राम गहे तेहि छांडहु, राम कबीर एक साथ ॥

यमदूतका कृष्णसे कबीरके भक्तके विषयमें वार्तालाप

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कवीरकृष्णगीता ।

राम भजे जो तजे दुचितार्ह । एक आस गुरु सब विसराई ॥ आतम पूजा भम विसारे । जीवदया गुरु साध सुवारे ॥ सतकी चाल राम जप लाई । आगे ताहि कवीरपंथ मिलाई ॥ राम वैकुंठ कवीर सतलोक । कवीर शरण मिटे जिवधोका ॥ सुनके दूत फिर सुन्य सयाये । जोतसरूपी कहैं गौहराये ॥ कहे दूत आतुर कह तोरा । जिव सब जाय कबीरकी जोरा ॥ ना जानो कहैं जाय समाई । जम बलहीन साधके ठाई ॥ तब हम कहा विष्णु सो जाई । विष्णु कहा घर जाहु रेभाई ॥ जब हर जीवके किये न खोजा । तब हम आये तुम्हरे सोजा ॥ को कबीर कहवाते आये । जीवहिं लेकर कहां सिधाये ॥ उठे अवाज सुनाते सोई । कबीरके दास छुवहु जानि कोई ॥ जिनके दिये राज हम करहीं । सो कबीर जिवलोक संचरहीं ॥ धर्मरायसे हम कहि राखा । औ पुन विष्णुसे महिमा भाषा ॥ विष्णु तो तोहि कहा समुझाई । धर्मराय तोहि नाहिं लखाई ॥ अब सुन राखहुं सब जमदूता । कबीरके दास छूवे अजगूता ॥ छुवहु कबहुं तोर बलहानी । हम हारे तोहि कौन बखानि ॥ सुनके दूत विष्णु हिग आये । विष्णुहिं कहा जमन सिर नाये ॥ अहो विष्णु देवनके ईशा । तुमहि कहा सो नैन न दीसा ॥ हम जो गये निरंजन दरवारा । शून्य अधियार भय कीन्हपुकारा ॥ उठी अवाज सुन्यते जबहिं । कबीरके दास छुयउ मत कबहीं ॥

दोहा—कहा निरंजन राय अस, संत द्रोह जम नास ।

राम कबीरहिं छोडके, औरहिं घालो फांस ॥

कबीरकी महिमा कृष्णमुख (सत्यलोक, जीव, निरंजन आदिका वर्णन)

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१०

कबीरकृष्णगीता ।

रामके भक्तन हरगण लावहिं । कबीरके दास नाम बल धावहिं ॥ रामके दास पूछे कहु केह बाता । जन कबीर सहुर रंगराता ॥ चहे विमान चले सब जाहीं । जागृत सतकबीर कहाहीं ॥ त्रिगुण जीव औ भूत पिशाची । पाप पुण्य आश्रित जमफांसी ॥ सतकबीरके जो हैं दासा । जेहि नहिं पाप पुण्यके आसा ॥ एकहि नाम कबीरहिं गावहिं । गुरुसाधुके सेवा लावहिं ॥ एकहि दूत गये जम धामा । साधु संत हरित लख रामा ॥ सबे देव औ सुखदेव व्यासा । को कबीर जेहि डर जमत्रासा ॥ केहे कृष्ण कबीरके लीला । सतनाम कबीर गहीला ॥ कबीर हैं अमरलोकके वासी । सो नहिं देह धरे चौरासी ॥ अमरलोक तिहु लोकते न्यारा । जहैंत यहां आये निरंकारा ॥ सो घर आदु सबनके मूला । सत्तलोक अमर अस्थूला ॥ जीव अमर सत्तलोकते आये । पूंजी सो अलस निरंजन पाये ॥

दोहा-आदु पिता सो सब, सो हैं सत्तकबीर ।

क्रीतम पिता सो बहुत, भये निरंजन नीर शरीर ॥ सत्तकबीरके अंस सोहंगा । आय रहै सो सबके संग ॥ सोहंग नाम ब्रह्मके दल । पांच पचीस त्रिगुण अहंकल ॥ तत ओंकार सोहंगम जीऊ । सत्तकबीर सब जिवके पीऊ ॥ जीव न चीन्है सत्तकबीरा । पांच तीनके धरे शरीरा ॥ अमर लोक हिरंभर काया । तहं सब हंसा केल कराया ॥ हम सब कहा सेवक बडभागी । जो कबीरके शरण न लागी ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

११

अब निज इच्छा भये है मोरा । सतगुरु करो कबीर बंदीछोरा ॥ केहि कारण हमहूं दुख पावा । निरंजन मोहि भग जठर रमावा ॥ जन्म मरण औ गर्भ वसेरा । कोटिन वार धरो तन फेरा ॥ जब कबीरको लेउं प्रवाना । तब मैं करिहों लोक पयाना ॥ जन्म मरण तब छूटे भाई । सतकबीर जब हृदय समाई ॥

व्यास सुखदेव गुरु उवाच ।

कहैं व्यास सुखदेव गुरु आदी । हम सब तुम्हरे सेवक आदी ॥ आप तार हमहूं कहैं तारो । जन्म मरण हर मोर निश्चारो ॥ तुम थोरे घर दस चौबीसा । इतन दुख हर धूनहु सीसा ॥ कहैं सुखदेव मैं परकं चौरासी । नामभक्त विन परे जमफांसी ॥ सही निर्गुण विन मुक्ति न होई । को हम सम तप करि है लोई ॥ सो तो हर चौरासी डारेहु । भक्तनकेर वाट तुम पारेहु ॥

विष्णु उवाच ।

कहैं विष्णु मैं करो का भाई । निराकार जैसे फरभाई ॥ पाप पुण्य कछु नहि जानो । पितु आज्ञा मैं सिरपर मानो ॥ नहि मानो तो मोहिं धर खाई । काह कहौं कछु कहत न जाई ॥ पिता निरंजन बड हर भोगा । दुखित सबे हिंहु पुरके लोगा ॥ जन्म मरण सब कोइ अरुझा । बांचे सतकबीर जेहि सूझा ॥ सतकबीर जेहि होय सहाई । ताके वारन बंके भाई ॥ पाछे रामचंद्र मैं रहकं । पितु आज्ञाते जन्म लियकं ॥ धन मम तिरिती निरंजन काळा । सबहिं खाय सुतकरे विहाळा ॥ कर व्याह बन पठहन मोही । पुन बन विपत दीन्ह बहु झोही ॥

काललीला वर्णन

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१२

कबीरकृष्णगीता ।

कोटिन जीवन हतन करावा । सब फल दे मोहि नरक भोगावा ॥ लोहड रूप धर मोहिं चेताऊं । केते रामचंद्र लख पाऊं ॥ तब रघुनाथ देह बन तेजा । देह गुप्त धरनीमह भेजा ॥ लैगौ दुतन निजपतिधामा । भक्ष कीन्ह तब राखेउ नामा ॥ कृष्ण नाम घर कथेऊं बाया । देह धरे व्यापे अब कामा ॥ राजा मनु तब कीन्ह बहूता । करता होहु हथारे पूता ॥ तब मोहि कहा निरंजन राई । दशरथके घर जन्मो जाई ॥ तब जन्मेउं कौसल्या पोटा । गरजत कहायेउं दशरथ बेटा ॥ तहैं बहु दुख सुख चिंता परऊ । अब कृष्ण देउ मजुरी दियऊ ॥ द्वापर केलि करहु तुम भाई । देवकी वसुदेव घर जाई ॥ जो मनु भये सो दशरथ राजा । जो दशरथ सो नंद विराजा ॥ केकई देवकीके घर जाये । प्रेम भक्ततवसा नंद घर आये ॥ नंदके घर कृष्ण अनंदा । पै कच्चा सुख तन यह गंदा ॥ कछु दिन सुख बहुते दुख दीन्हा । लडत बधत जिवघात बहु कीन्हा ॥ टीका पुरे यदुवंश मरावा । गोपी सब मारजाट लुटावा ॥ तब मोहि व्याधा हाथ मरावा । बहुर बौध रूप फरमावा ॥ कर ताको आज्ञा सिर मानी । बौधरूप जग धरायउं आनी ॥ जैसे गऊ हत्या काहु लगे । रहै मरुट तीरथ व्रत भागे ॥ कहिनकी मारेहु ब्राह्मण भांटा । और अनेक जीव तुम काटा ॥ परनारीसे तुम रति कीन्हा । कहा जताय जात जू लीन्हा ॥ आप कहायऊ सिरजनहारा । ताते विष्णु चैविस तनधारा ॥

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कविरत्नकल्पगीता ।

१३

जब हत्या छूटे हरि केरा । निहकलंक औतार साधु वस चैरा चारों जुग आयेंउं कइ वारा । जुग जुग२ आय धरैव औतारा॥ मैं तो बोइल देव पितु पाहीं । मैं कस न बोइल जीवपै चाहौ ॥ बोइल न छूटे कोट उपाई । कोट अनेक जिन सांसत पाई ॥ जो मैं करों सो पिताके आज्ञा । तापर श्रेष्ठ सो सद्गुरुसंगा ॥ सद्गुरुके संग कपे काला । सद्गुरु सत्तकवीर दयाल्ला ॥ कर्म भोग फल सब जिव पावे । कयों नहिं सुखकी राह चलावे ॥ वेद शास्त्र सब तनका वाणी । करने चले वाट पहिचानी ॥ चित सोई जो पर उपकारी । नार सोई पिव दरश अघारी ॥ सोई शिष्य गुरु शब्द जो माने । सोई पुत्र पितु सेवा ठाने ॥ सोई बहु जो सास सहेली । खसम सहेली सो बेलि चमेली ॥ पुत्री मातसे दुतिया वाणी । तम फल बीज जो बोवे प्राणी ॥ औरहिं देय जो भोजन करहीं । सो प्राणी वैकुंठे तरहीं ॥ भूखे अन्न प्योसेको पानी । नांगे वस्तर देय सुखखानी ॥ सुखी सोई जो पर तन पोषे । आनहिं वंचित पावे सोइ मोषे ॥ कोट जग्य पुण्य फल पावे । कसाई सो जो गाय छोडावे ॥ काहु जीव सो द्रोह न करई । जीवद्रोह कर नकें परही ॥ भूखा विष्णु अन्नजेवावे । गऊ कोट मुक्त फल पावे ॥ सकल देह व्यापे सतनामा । रमता राम सकल विश्रामा ॥ विष्णु बडे भागते होई । विष्णुपंथविन तरे न कोई ॥ इह बांधो सतभक्त कबीर । औ जस खेती पान शरीरा ॥

कालसे बचनेका मार्ग

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१४

कबीरकृष्णगीता ।

विष्णुके भक्त लावनी होई । खेतंगी माता भक्त विलोई ॥ उसर भक्त आये शिवकेरा । ब्रह्मा भये अपूज्य सकेरा ॥ भूतनी उंकनी भैरो काली । यह जीव अयस्वानी जंजाली ॥ सवा लक्ष जिव नित प्रति चाही । निरंकार तर भोजन खाही ॥

दोहा-क्या पापी क्या पुण्य कर, काह न छड़ि काल ॥ सवा लक्ष जिव रात दिन, नित खाहीं निराकार ॥

पापी घींच नरकमें दीन्हा । पुण्यी जीव चूस सो लीन्हा ॥ ज्यो नरको भोजन है निका । खाय जुडाय तपन गई जिवका ॥ तैसे काल चवावे रस पुच्छका । पुण्य क्षीन तब जीव भये सुन्यका ॥ थुथक लीन्ह सीठ जब भयऊ । दूतन आन चित्र पंह दियऊ ॥ सुचि बचाय जमावै धाई । पाप पुण्यके लेख चुकाई ॥ चित्र गोपित्र कह ले कछु बांचा । सब फासिक देवन घर जांचा ॥ तब जत पुण्य बांच सो दीन्हा । डारेउ नरक जन्म संग लीन्हा ॥

दोहा-पुण्य करावे छलके, जीवनको निराकार । पुण्य चूस ले आपनो, जीव नरक ले डार ॥

कबीरके शरण कालते बांचा । कबीर शरण बिन जमवर नाचा ॥ यह कछु बात कहनकी नाही । रही सोच मनही पछताहीं ॥ जेहि लख परे गहे गुरु पूरा । कबीरको मनुष्य कहे कोइ कूरा ॥ सुखदेव सुनत यगन मन भयऊ । व्यास पितासो विनती कियऊ ॥ जन कबीर देहु गुरु मोरा । सत्त कबीर रक्षक बंदीछोरा ॥

निरंजन और विष्णुका संवाद व चौरासीका वर्णन

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कवीरकृष्णगीता ।

१५

व्यासदेववचन ।

कहैं व्यास अस साहेब नीका । जमके आस मिटे जो जिवका ॥ ठाकुरसो विनवें सुनि व्यासा । कौन कवीर आवे तुव पास ॥ जब मैं सुमरों दीन दशाला । सट्टरु कवीर मगटे क्पाळा ॥ कहैं व्यास तुम ठाकुर मोरा । बेग मिठाव कवीर बंदीछोरा ॥ सुखदेवके मन उपजी इच्छा । कवीरकेर मैं लेऊं दीक्षा ॥ दान पुण्य बहु तीरथ जोगा । सचनाम विन भये सब रोगा ॥ माया मोह कछु काम न आवे । सट्टरु विना नर नरकसिंघावे ॥ धन सट्टरु सतनाम कबीरा । जम जालियको भेटे पीरा ॥

विष्णु वचन ।

कहा विष्णु महाविष्णु सो जाई । महाविष्णु निरंजन राई ॥ सुखदेव व्यास औ देव अनेका । कबीरहिं सट्टरु किये चहे ठेका ॥

निरंजन वचन ।

कहैं निरंजन गुताहिं राखो । कहु काहूके आगे न भाषो ॥ कबीर जोगजीत औतारा । तिन तो सीस हमारा मारा ॥

दोहा--मैं अछुंगी आसेऊं, जोग हने मम शीश ।

रूप रेख विन भयउं तब, नाम मोर जगदीश ॥

जेहिते कूर्म बिने शिर नाई । कोट विनति कै सीस दिबाई ॥ मोर सीस देहौ सत्त कबीरा । तबते डर भरहरे शरीरा ॥ जो कोइ सत्त कबीर पथ चहई । तेहिमें आपन माथ निरबहई ॥ सट्टरु कबीरकेर यह शीती । शरण गहे तेहि नहिं बेधीती ॥

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१६

कबीरकृष्णगीता ।

कोट जनमके पापी होई । भमे तीर्थ अवमल चहे धोई ॥ पाप न छूटे कोट उपाई । कछुहरि शरण पाप दुर जाई ॥ अवनाथक सतनाम कबीरा । जाके निहचल अजर शरीरा ॥ कबीर शरण जिव पहुँचा चाहे । पौत चला कछु रहे सो राहे ॥ और जहांलग जीव जहाना । सब कबीरके मैं गुरु बखाना ॥ जैसे गऊ गोरणिया राखे । पौसै गऊ कबहुँ रस चाखे ॥ गोरस रास गऊ रवाणीके । सांझ सकारे छाँछ महीके ॥ जैसे मैं कबीरके चेरा । कबीर पुरुष मम पिता सुखेरा ॥ मैं कपूत सब बंधु सयाना । वे सब निकट मैं दूर समाना ॥ मैं अपराधी दरश बिहूना । पुरुष दरश विन मंदिर सूना ॥ जहँ मैं रहों सुन्य तेहि नाऊ । तुम विनपुरष सुन्य सब ठाऊँ ॥ धन्य जीव जो सद्गुरु सेवे । सद्गुरु सेय परम पद लेवे ॥ परमपद सोई भवते न्यारा । भौसागर तुम कष्ट अपारा ॥ तीन लोक तव करिहों राजू । जब कबीरसों करिहों साजू ॥ हमरे पिता त्रिगुणके आजा । सतकबीर सुमरै जिव काजा ॥

दोहा—जो समर्थके जीव हैं, सो नाम कबीरके लेंय । तिनकी सेवा तुम करो, सुफल कबीर कहैं सेय ॥ सुनके विष्णु कृष्ण औ रामा । पुलकित भये तब विष्णु सुजाना पूछा निरंजन कस खुशियाला । कबीर नाम सुन गात रिसाला ॥ कहैं विष्णु हम अति पुलकाने । हमपर दया कबीर बहु ठाने ॥ कहैं निरंजन तेहि बड भागी । दीन्हो जाय कबीर सोहागी ॥

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कवीरकृष्णगीता ।

१७

कहैं निरंजन विष्णु सपूता । सवा लक्ष भक्ष देहो पूता ॥ विष्णु वचन ।

कहैं विष्णु सब तुम्हरीं दाया । नित्य काट देउँ आपन काया ॥ इक आज्ञा प्रभु मोकहूँ करहूँ । मैं सद्गुरु कवीर पग धरहूँ ॥ गुरुकी भक्त भात पितु सेवा । साधुसेवा फल बैठे लेवा ॥ निरंजनवचन ।

कहैं निरंजन मन हर्षाई । सद्गुरु करो कवीरको जाई ॥ सद्गुरु प्रगट दुनिया दिखलाई । जाते लोग न जाने भाई ॥ यह सब समुझ बूझ हर्षाये । जाय सबन सानंद सुनाये ॥ अब तुमसब मिल राधहु ध्याना । हमहूँ सत्त कवीरहि जाना ॥ कवीरके ऊपर और नहीं कोई । आप कवीर पुरुष हैं सोई ॥ तीन लोक सबते अधिकारा । जोत स्वरूप निरंजन निराकारा ॥ सेवक सम लघु आपहिं जाना । एक कहिन कोउ बहुतक जाना ॥ कवीर भजे सो मोहि गुनदाना । सत्त पुरुष निर्भय निर्वाना ॥ प्रगट राम कृष्ण निराकारा । सब मिल गुप्त कवीर अधारा ॥ अमी बुंद सो सत्तकवीरा । विषय निरंजन नीर शरीरा ॥ प्रेम भक्त नहीं छिपत छिपाये । गुरुसो अधिक कौन अस जाये सरगुणके प्रेमाधिक गुरूवा । जन्मत भरत भये अति हन्ना ॥ सत्त कवीर अखंड सुखदाता । तिनके भक्त दुख जाय निपाता ॥ जो कवीर कहिहै सो करई । गुरुकी दयाभात पितु तरई ॥