भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

कवीरकृष्णगीता ।

१७

कहैं निरंजन विष्णु सपूता । सवा लक्ष भक्ष देहो पूता ॥ विष्णु वचन ।

कहैं विष्णु सब तुम्हरीं दाया । नित्य काट देउँ आपन काया ॥ इक आज्ञा प्रभु मोकहूँ करहूँ । मैं सद्गुरु कवीर पग धरहूँ ॥ गुरुकी भक्त भात पितु सेवा । साधुसेवा फल बैठे लेवा ॥ निरंजनवचन ।

कहैं निरंजन मन हर्षाई । सद्गुरु करो कवीरको जाई ॥ सद्गुरु प्रगट दुनिया दिखलाई । जाते लोग न जाने भाई ॥ यह सब समुझ बूझ हर्षाये । जाय सबन सानंद सुनाये ॥ अब तुमसब मिल राधहु ध्याना । हमहूँ सत्त कवीरहि जाना ॥ कवीरके ऊपर और नहीं कोई । आप कवीर पुरुष हैं सोई ॥ तीन लोक सबते अधिकारा । जोत स्वरूप निरंजन निराकारा ॥ सेवक सम लघु आपहिं जाना । एक कहिन कोउ बहुतक जाना ॥ कवीर भजे सो मोहि गुनदाना । सत्त पुरुष निर्भय निर्वाना ॥ प्रगट राम कृष्ण निराकारा । सब मिल गुप्त कवीर अधारा ॥ अमी बुंद सो सत्तकवीरा । विषय निरंजन नीर शरीरा ॥ प्रेम भक्त नहीं छिपत छिपाये । गुरुसो अधिक कौन अस जाये सरगुणके प्रेमाधिक गुरूवा । जन्मत भरत भये अति हन्ना ॥ सत्त कवीर अखंड सुखदाता । तिनके भक्त दुख जाय निपाता ॥ जो कवीर कहिहै सो करई । गुरुकी दयाभात पितु तरई ॥