कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कवीरकृष्णगीता ।
१७
कहैं निरंजन विष्णु सपूता । सवा लक्ष भक्ष देहो पूता ॥ विष्णु वचन ।
कहैं विष्णु सब तुम्हरीं दाया । नित्य काट देउँ आपन काया ॥ इक आज्ञा प्रभु मोकहूँ करहूँ । मैं सद्गुरु कवीर पग धरहूँ ॥ गुरुकी भक्त भात पितु सेवा । साधुसेवा फल बैठे लेवा ॥ निरंजनवचन ।
कहैं निरंजन मन हर्षाई । सद्गुरु करो कवीरको जाई ॥ सद्गुरु प्रगट दुनिया दिखलाई । जाते लोग न जाने भाई ॥ यह सब समुझ बूझ हर्षाये । जाय सबन सानंद सुनाये ॥ अब तुमसब मिल राधहु ध्याना । हमहूँ सत्त कवीरहि जाना ॥ कवीरके ऊपर और नहीं कोई । आप कवीर पुरुष हैं सोई ॥ तीन लोक सबते अधिकारा । जोत स्वरूप निरंजन निराकारा ॥ सेवक सम लघु आपहिं जाना । एक कहिन कोउ बहुतक जाना ॥ कवीर भजे सो मोहि गुनदाना । सत्त पुरुष निर्भय निर्वाना ॥ प्रगट राम कृष्ण निराकारा । सब मिल गुप्त कवीर अधारा ॥ अमी बुंद सो सत्तकवीरा । विषय निरंजन नीर शरीरा ॥ प्रेम भक्त नहीं छिपत छिपाये । गुरुसो अधिक कौन अस जाये सरगुणके प्रेमाधिक गुरूवा । जन्मत भरत भये अति हन्ना ॥ सत्त कवीर अखंड सुखदाता । तिनके भक्त दुख जाय निपाता ॥ जो कवीर कहिहै सो करई । गुरुकी दयाभात पितु तरई ॥
शुकदेव मुनिका अपने अनेक जन्मोंका वृत्तान्त कहना
१८
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु तुम धीरज धरहू । सब मिल स्तुति कबीरके करहू॥ कहैं कृष्ण सुन सुखदेव व्यासा । कहहुँ चौरासी करे विलासा ॥ डारत निरंजन शोकँह चौरासी । सच कबीर काटे जबफांसी ॥ दस चौबीस जन्म भौ मोरा । दया कीन्ह कबीर बंदी छोरा ॥ तुम सब भ्रम आये चौरासी । चौरासी दुख कहुँ संग यासी ॥ चौरासी कर लेतहिं नाथा । सुखदेव व्यास त्रसित अति जामा कहैं कृष्ण तुम काहे कंपे । सुचिछत होय धराणि किमि चंपे॥
व्यास सुखदेववचन ।
कहैं व्यास सुखदेव सुन रामा । का तुम लेहु चौरासी नामा ॥ नाम लेत चौरासी केरा । अबही कंप उठा जिव मेरा ॥ चौरासी लक्ष योनि दुखरासी । मम अरिजनसों परेउँ चौरासी ॥ चौरासीका सुनहुँ विलासा । पंछी योनि जम लावहिं फांसा ॥ लेय बझाय उखारिस पांखी । पांव टोर लेसी बस आंखी ॥ कोइ दुइ चार दिवस यह हाला । काहूकेर तुरत होय काला ॥ भूँज २ कर तेहि फिर खाई । काहु तरे काहु भूँज पकाई ॥ जाहि मार जो करे अहारा । सो तेहि मोर सौ २ बारा ॥ हभहु हारिल सुवना भयऊ । लासा लगायबझाय जमलयऊ ॥ जीवत एक २ पंख उखारेसि । जियतहिं प्राण बाज सुखडारेसि ॥ तीसर दिन जिव निकसे भाई । घर २ भिन्न जीवत कट जाई ॥ यह संक्षेप कष्ट बरणाई । सज पंछी तन भ्रमेउ भाई ॥ शीत कृष्ण सहि भवन बिहुना । पत्थर मार करे सब चूना ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१९
बरसे पानी बहे समीरा । तरुवर डोले अतहि गंभीरा ॥ चरन जाउं डरपौ दिन राती । जस भंजर टोरे कोइ छाती ॥ भयउं वृक्ष तब छीले छाला । कोइ जर काट करे वेहाला ॥ गउ भयेऊं तब दुख कछु थोरा । पुछमान गउ वृक्ष अंजौरा ॥ बकरा भया चला बल देने । फांसी लगाय गरा गहि लीन्है ॥ खैंचे जाय वेदरद कसाई । भोथा शस्त्र सो गला कटाई ॥ अधमरा काट दिहिसभोहिडारी । छूटे न प्राण महादुख भारी ॥ लेकर विप्र गये घर अपना । काटेसि गर छिन मिटी कल्पना ॥ चीन्तूर भयेउं वसेउ तेहिमाहीं । टोय निकरेसी रुधिर पियाहीं ॥ मलत २ मारेसि अध मरके । दीन्हैसि डार हाहूतमह धरके ॥ बडे कष्ट छूटा तहैं प्राणा । सर्पखान जिव जाय समाना ॥ जहैलग सर्पखान जो जितनी । भमैंउं सब अजगर अवजोनी ॥ अजगर तन अतिभये मितभारी । लूक आग तन निशिदिन जारी ॥ भूखन मरही प्यासन मरही । तेहिपर अष्ट काल निशि जरही ॥ भारी देह चला नहिं जाई । दलमैं परे अहार भक्ष खाई ॥ दस हजार कोइ बीस हजार । सहस्र पांच शत कोइ जियारा ॥ अस जीवनसो मरना भले । पाख बीते कछु भोजन मिले ॥ जिया जंतु जो सोहैं धावे । स्वास संग खैंचि सुँह आवे ॥ महाकष्ट दुख अगम अथाहा । धन्य गुरु जिन तह निरवाहा ॥ सरगुणके गुरुको क्या देश । सोई देय कहुँ पास जो जैसा ॥ निगुण भक्त बिना गत नाही । मिला कबीर सब त्रिखा बुझाहीं ॥ और सुनहु चौरासी पीरा । भिक्षा माहिं भयऊं तब कीरा ॥
२०
कबीरकृष्णगीता ।
मर भिक्षा मह फिर तन धरई । सतनाम विन भर्षेत फिरई ॥ नरक भर्षाहिँ औ नरक निवास। भिक्षा सेज भोग कविलासा ॥ भिक्षा कीराते सूकर भयऊँ । चमकत फिरोँ नरक भष रहऊँ ॥ भयउं भान तब हाड टटोरा । भिक्षा भखी जन्म दुख झोरा ॥ एक दलिदर मोकहैं पाला । सीसलाय पालेसि योहिँ काला ॥ पुष्ट भयऊँ अहार जब बाढा । पापी भक्ष देन तब छांडा ॥ आप खाय भर पेट अघाई । शास एक योहिँ देय ललचाई ॥ खाय पेट भर उठे तब झारी । कबहुँक देय शास एक मारी ॥ ताते भान पाले मत कोई । जो पाले सो भक्ष देय सोई ॥ भक्ष नहीं देय परे अघरानी । सबयो एकै राम बरानी ॥ भयऊँ वाघतबकियेऊँतनघाता । मै नहिँ कीन्हसो कीन्ह विधाता ॥ करता काल करावे आपे । जीव श्राप हे अघ अस्थापे ॥ कर्ता काल निरंजन स्वामी । गढे भरे तन अंतरजामी ॥ जीवहिंदुखसुख बहुविधि देही । सुख किंचित दुख खान भरेही ॥ सतकवीर हैं सबके मूला । तिनके भक्त भिटे दुख शूला ॥ पुनि मै भयउं सिद्ध अघ यासी । सरे ढोर आसेउं अघरासी ॥
दोहा—और कहाँ लग बरणों, चौरासीदुख मूल ॥
सत् कबीर मिले जब, मेटे सब दुख शूल ॥ कहै कृष्ण हम नीके जाना । हमहुँ लेव कबीर प्रवाना ॥ हमहुँ पिता सो विनती कीन्हा । पान लेन कहै आज्ञा दीन्हा ॥ सतकवीर जब दाया करहीं । आपन जान मो देउ धारही ॥ यह कह उत्तर दिशि शिर नावा । नारद सुनि तब बात चलावा ॥
गुरुकी महिमा
कवीरकृष्णगीता.
२१
नारद वचन ।
प्रभु तुम कहेउ प्रथम हम ईशा । पुन बूझा तो निरंजन सीसा ॥ सीस जाय अब अंते लागा । सत्कवीर सीस अब जागा ॥ बिन कवीर मुक्ति जिव नहीं । योग यज्ञ बहु जतन कराहीं ॥ यह दंडवत तुमकाकंह कीन्हा । ताकर मोहि बतावो चीन्हा ॥
विष्णुवचन ।
सुन नारद हरि कहैं बुझाई । गुरु पितु मात साधु सिर नाई ॥ सत्कवीर कहैं कीन्ह प्रणामा । आय दरश दीजे सुखधामा ॥ कवीरके शिष्य राजा निरमोहा । ताहि प्रणाम कीन्ह बहु छोहा ॥ धन्य राजा निरमोहकी वाणी । हर्ष विशेष कछु लाज न हानी ॥
नारद उवाच ।
कह नारद मैं देखों राजा । तिनके दरश होय मम काजा ॥ धन्य निरमोह जेहि कृष्ण सराहा। उनके दरश करें चित चाहा ॥ आज्ञा करहु जो श्रीयदुराई । तो निरमोह दरश कर आई ॥ आज्ञा किये दरश गये करहु । दरश निरमोह जियत जिव तरहु ॥
राजा निरमोहकी कथा ।
चले ऋषी दरश निरमोहा । सभा निरमोह तर गये निरमोहा। नृप निरमोहके एकहिं बारा । गयेउं कुटम चार सुत बारा ॥ नारद जाय द्वार होय वैसे । ससै शुल भूप धर जैसे ॥ सुंदरी एक अब कहा बुझाई । नृपकर सुत नियते मर जाई ॥ ले संदेश नृप सुतके आयऊं । भये परले ऋषि रौर करायऊं ॥
२२
कबीरकृष्णगीता ।
रोवत नारद सुंदरी उठ नाची । कहे सुंदरी मरना दिन सांची ॥ कहैं नारद सुन सुंदरी पापिन । चूपसुतहतन सुन हंसस कस पापिन सुन्दरी कहे संगत मय ऐसी । हाटबजारकी सौदा जैसी ॥ एक दुकान गहकी दस मिला । सौदा लेले चले अकेला ॥ को केहि लाग करत है सोगा । अस हम निरमोही लोगा ॥ नारद ज्ञान सुनत मन मूर्च्छा । बहुर नारद सुंदरी कह पूछा ॥ राजहि केर सुभाव जस तोरा । की घट बट सहि कहू रोरा ॥ सुंदरी कहे देख कृषि आंखी । निज चक्षु दोखि कस सांखी ॥ यह कह सुंदरी मंदिल पैठे । सुनि जहैं तहैं जहां जो बैठे ॥ कहे सुंदरी द्विज आये द्वारे । उन संदेश कहि कुंभरही मरे ॥ सुन राजा रानी सुत नारी । निरत करत आये सब द्वारी ॥ नारदकृषि कहैं कीन्ह प्रणामा । कहैं कृषि तुव सुत हरि लिये रामा सुनत वचन कृषिराय अनंदा । गावहि मंगल लाग करंदा ॥ राजा कहे लाव निरत काली । गावत कुंभरके खाट निकाली ॥ राजाकी रानी उठ गावे । कुंभर बधू सेंदूर चढावे ॥ पायक महाउत आय धाई । मंगल गावहिं गाय बजाई ॥ गावहिं मंगल हंस चलावा । महा अचंभो नारद आवा ॥ नारद उठ राजहि संबोध। रानी कुंभर बंधहिं प्रयोधा ॥ तुव सुत मृत्यु वचन हम बोले । पै तुव सबके वदन न ढोले ॥ कैसे तुम सब हृदय कठोरा । पुत्र मृत्युक सुनकरहु न रोरा ॥ सही राजा तुम बडे धर्म धीरा । पुत्र सुये कर राज प्रचीरा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
२३
नृपाति वचन ।
कहे नृप ऋषिसौ कहैं सो साँचा । राज करनको देही काँचा ॥ हम सबके संगत दिन चारा । मरनो रोर न धन वित धारा ॥ आन मरे तो रोइये भाई । मरन आप अमर रहि जाई ॥ गुरुमुख मरे रोवे नहिं भाई । साकट मरे विकल होय जाई ॥ गुरुमुख भये काल भौ नासा । साकटके गले जमको फाँसा ॥ बहुरि समुन्नत ताही नहिं रोई । दाया सतसाहेबके होई ॥ सतसाहेब सतनाथ कबीरा । तिनके हम सेवक रणधीरा ॥ हमरे साहेब यह कह दीन्हा । जीव सुये चिंता नहिं कीन्हा ॥ चिंता सोइ सुमरिये नामा । सब चिंता येटे सतधामा ॥ जो आये हमहू तन धारी । रहेन कोइ राम कृष्ण नरहारी ॥ गुरुसेवा सोई शुभ कामा । और सकल जग काम अकामा ॥ गुरु जब मिले सद्गुरु पूरा । जीव बचावे जमसो सूरा ॥ जालिम काल निरंजन बाँका । त्रिध देवा निस लावहिं आसा ॥ सबकहैं खाय निरंजन राई । बांचे सचकवीर लौलाई ॥ ऐसे संगत हमरे स्वामी । कैसे संगत कहु नृप नामी ॥ कहैं निरमोह सुनो ऋषिदेवा । उतरे पार लोग एक सेवा ॥ जो जहँके तहँवा चलि जाहीं । कोउ काहूको पूछत नाहीं ॥ आपन २ समर्थ साथा । आदनाम समर्थ सुखदाता ॥ समर्थ गुरु साधुकी सेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥ तीर्थ व्रत तप योग यज्ञधर्मा । गुरु विन मरे कालबरवंधा ॥ गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्म मरण गुरु लागिह सीठा ॥
२४
कवीररुणगीता ।
पुन नारद रानीकहैं पूछा । सुत विन तोर गोद भयो छूछा ॥ गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरु नाम लखावा ॥ कहैं रानी गहुं नृपके पाऊं । छूछा सोईजो गुरु न कराऊ ॥ गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरुनाम लखावा ॥ हमरे स्वाधी सिरपर आहीं । गुरु साधन बल हर्ष कराहीं ॥ कहा कृपी तैं डाइन आही । तेही पुत्र स्वाय निज चाही ॥ सही ऋषितै निहचे यह भाषा । ऐसी बोले सहे तुव साखा ॥ मात पिता जो सुतकहैं खाले । कहु जन्म छटी प्रतिपाले ॥ जैसे निरंजन पाले वाले । ऐसी चाल तुमहिं कहैं चाले ॥ हमरे साहेब सत्कव्वीरा । अमित प्राप्त तेही अजर शरीरा ॥ सो पालक बालक निराकाला । ताहिगिसल तुमवो अस चाला ॥ निरंकार बहु तन धर मूवा । पुरुषके वंश निरंजन तूवा ॥ दश अवतार महा दगपाला । हरि हर अज धर खाये काला ॥ कवीरके हंससे काल निनारा । सो पहुँचे सतपुरुष दरवारा ॥ सत् पुरुष सोई सत्कव्वीरा । कोइ जन भूले देख शरीरा ॥ ऐसी मम संगत ऋषिराई । कैसी संगत कहहु बुझाई ॥ जश पंछी लिये वृक्ष बसेरा । चुगन चले जित कित तब फेरा ॥ को केहि पूछ कुशल औ क्षेमा । ऐसो पुन निरयोह व्रत नेमा ॥ पुन नानाविध भावना कीन्हा । एक रती कछु मोह न चीन्हा ॥ नारद पूछा कुंभर बियाही । तुव मन बहुर जारके पांही ॥ कहैं बहुर नृपके सिर नाहीं । सास बंद गुरु स्वाधी सुख चाही ॥ हमरे स्वामी सुवा न मरि हैं । तजके देह अमर तन धरिहैं ॥
कवीरकृष्णगीतः ।
३५
सचछोक सुख अभूतस्नानी । एके संग रहब दोह प्राणी ॥ तुम्हरे वंश होइहे रांडी । कंथ बेसुख धगडन सो मांडी ॥ मैं पतिव्रता सटुरुके चेली । आप देऊं तो साथ मत हेली ॥ एक कहाँ सो सब सुन राखो । प्रातीह नारद सुख नाम भाषो ॥ नारद कोप कीन्ह परनामा । मोपर कोप न कीजे बाया ॥ जाकर स्वामी भर जग जाई । सुनतहीं रोर करे चिल्लाई ॥ कुंभर बध कहे सुन कपि सुर्षा । रोष जिये तो मरे न पुरुषा ॥ मरे सोइ जो गुरु नहीं कीन्हा । हमरे शिरपर सपर्य चीन्हा ॥ जेते दिना लिखा एक संग । वोही जोत मई धसत पतंगा ॥ ऐसी संगत हमरे पाई । अस सोइ करे ज्ञान जेहि याडे ॥ कैसी संगत तुम्हरी बाला । जसपनिहारिन कलशभरि चाला ॥ दस घरकी तब एकहिं ठाई । कलश भारि २ लीन्ह उठाई ॥ घाट पंथ जित तित भई नारी । ऐसी संगत कृषी हमारी ॥ ऐसी समय कुंभर चलि आये । नारद सुख देख कारिख आये ॥ कुंभर उतर कीन्हे प्रणामा । परम गुरु पितृ मात द्विज रामा ॥ नारद कुंभरसो विनती लाई । हम यह दरश एक बात जनाई ॥ मिथ्या वचन कहा हम आई । तुम्हरे सुयेकी खबर जनाई ॥ कोइ तोह लाग रोवे नहीं भाई । तुव मृतु सुन सबगती कराई ॥ कहैं कुंभर रोवे किहि काहीं । जो रोवे भरना पुनि ताही ॥ सुये कारण नहीं रोइये स्वामी । तब मृत्युका गाडे प्राणी ॥ सुये चलावा मंगल गाई । गुरु साधुकी सेवा लाई ॥ अन्नदान कंचन दिज जाना । मृतुका पहुंचे गुरु निज धामा ॥
३
२६
कबीरकृष्णगीता ।
अविनाशी राम सोइसत कबीरा । सो मम सतगुरु अजर शरीरा ॥ ऐसी संगत हमरी पांडे । हम सब जीवहिं जाने भांडे ॥ कहो कुंअर अस संगत तोरी । सुनहु ऋषी अस संगत मोरी ॥ जैसे पथिक बसे सराई । प्रात भये अपने पथ जाई ॥ कोउ काहूको बात न पूछा । प्राण गये जस काया छूछा ॥ हम सबके जीवन सतनामा । सतसंगत गुरु भक्त विथामा ॥ नारद उठ परिक्रमा कीन्हा । तब चूप सुतहिं जो बैठक दीन्हा ॥ ऋषी विनय कर पाक कराई । नाना व्यंजन परसे जवाई ॥
दोहा-बिदा भये ऋषि नृपते, आप नगर महद्देख ।
हर्ष विस्मय ऋषि चित्तमें, कला निरमोह अलेख ॥ एक चमार चलेउ पुर माहीं । सोई मृत्यु कहैं रोवत नाहीं ॥ तहां जाव नारद भये ठाढा । कृत्य करत मृतुक ले काढा ॥ तब ऋषि पूछा सभरहि जाई । कस नहिं रोवस मनुष भराई ॥ हाडी कहै रोवहिं कोहि लागी । गुरु मुख होय मुख अतुरागी ॥ साकट भरे काल मुख जाई । गुरुमुख तनतज हरिपहैं जाई ॥ राजा भयो कबीरको शिष्या । हम सब रामचरण चित लिख्या ॥ राम भजे सो साधुकी चाली । भिला कबीर भिटा जंजाली ॥ जो जन्मे तेहि मृत्यु कर लेखो । महितन अच्छत जियत ना देखो ॥ जिन प्रभु दिया तिनहिं हरलिथा । मरन जियनकी सोच न किया ॥ ऐसी संगत आय हमारी । कैसी संगत कहो विचारी ॥ ऐसी संगति ऋषि सुनि मोरी । तिरबो अस जस लकडी जोरी ॥
सच्चे गुरुकी पहिचान
कवीरकृष्णगीता ।
२७
छूटे भँवर होय दोय दीशा । दोमहँ एक रोक नहिं दीसा ॥ कुशल काहुकहँ पूछहिं भाई । ऐसी संगत हमरि गोसाईं ॥
दोहा सुन नारद अचरज भये, हरि पहुँ कीन्ह पयान । हरिसे चरित्र कहा सब, धन निरमोह सुजान ॥
ऋषि उवाच ।
कहँ ऋषि सुन दीन दयाला । नृप निरमोह जियत कलिकाला ॥ अस २ संत आहिं जग माहीं । धन्य जो सतकवीर जेहि छाहीं ॥ अस योहि दया करो भगवाना । वस्ती तज वन करहिं पयाना ॥ कुल परिवार झूठ हम जानी । सत्तनाम एक सार बखानी ॥
कृष्ण वचन ।
कहँ कृष्ण वन किभि चलि जाहू । गुरुके गूह निज भाकि कमाहूँ ॥ हम ब्रह्मा सुत सब ते जेठे । जगमें और सकल मम हेठे ॥ कहँ कृष्ण जो करता आवे । बिन गुरु ते उबार नहिं पावे ॥ तुम कितने आहू किह माहीं । मम निरवाह गुरु बिन नाहीं ॥ गुरु बिन साकट प्रेत समाना । साकटके सिर जमको थाना ॥ धरती कहँ साकट है भारी । औ प्राणी भारी बेविचारी ॥ जस चंदा बिन रैन औधरी । तस साकट ले जिव जन घेरी ॥ रवि न दिवस ईश बिन सैना । गुरु बिन साकट अंध जन नैना ॥ बिन देवल देवस्थल जैसे । बिन गुरुके प्राणी है तैसे ॥ बिन दीपक जस घर औधियारा । तस गुरु बिन साकट जम चारा ॥ कहँ नारद गुरु का कहँ करऊं । जेहिने तुम्हरे चित संचरऊं ॥
२८
कबीरकृष्णगीता ।
कहैं कृष्ण गुरु कर निरबंदा । नारी तजै तजै कुल दंदा ॥ विष्णव गृह त्यागीं वैरागी । ऐसे गुरुके शरणन लागी ॥ गुरु कबीर पंथतन धारी । सदुरुके सब जिव निस्तारी ॥ सदुरु सत्कबीर निरवाना । जाके त्रास काळ भय माना ॥ अब तो गुरु तुम प्रातहिं करहु । प्रात प्रथम मिलै तेहि पण धरहु ॥
दोहा-नारद गवने निज मठ, प्रात जाय गुरु कीन्ह ।
मछवा मिलै पंथ महँ, तासो दीक्षा लीन्ह ॥
दीक्षा ले वैकुंठ पगु धारे । हरिके आगे वचन उचारे ॥ गुरु कियौपै जातके हीना । तुव आज्ञा मछवा गुरु कीन्हा ॥ कहैं कृष्ण गुरु कहैंपै लाऊ । अब ऋषि तुम चौरासी जाऊ ॥ बेगि जाहु तुम गुरुके पास । अपने औगुण करहु प्रकाशा ॥ तब गुरु आज्ञा जैसी होई । किये निसतार सुनहु ऋषि सोई ॥ चले ऋषि तेहि जग महँ आथे । बहुर तहां गुरु दर्शन पाथे ॥ चरण सीस दे विनती लाई । मोहिसे अवगुण भयउ गोसाई ॥ कैसे अवगुण बेगि सो कहहु । गुरुसे कह अंतर अवकरहु ॥ गुरुसे कपट करे गुरु जिंदा । साधु द्रोह नर यमके बंदा ॥ सुनत ऋषि थरहर पगु धरेऊ । केहि अवगुणसे प्रगट कहेऊ ॥ भयउ दया तुम दीक्षा दीन्हा । ठाकुर मोसन पूछन लीन्हा ॥ कहहु ऋषी गुरु कैसन कीन्हा । तब हम कहैं गुरु कीन्ह कर्थाना ॥ ऐसे कहि हम वचन अधीना । हमरे जोग नहीं गुरु ध्याना ॥ औपै नीच जातपै आना । * * * * *
नारदके गुरु करने और चौरासी भोगसे छूटनेकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
२९
यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥ तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥ कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥ ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥ अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥ तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥ चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥ लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥ लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥ कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥ भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥ कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥ कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥ पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥ सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे
दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।
कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥
गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥ गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥ नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥ जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥
३०
कबीरकृष्णगीता ।
धन्य गुरु अब धन्य सो कहिये । जासु चिन्हाये गुरुपद लहिये ॥ यथमहि रजगुण गुरुकी महिमा । सुनहु सतोयुण गुरुकी महिमा ॥ तमगुण गुरुकी कहहुँ सुभाऊ । देवी पंथकर चाल लखाऊ ॥ देव निरंजन पंचम कहिये । जोत अकाश होय दरशन लहिये ॥ छठयें जीव सतयें सतनामा । सत्यनाम संतन सुखधामा ॥ संतके प्राण सब जीव सुखदाई । सोई सत कबीर गोसाई ॥ एक जीव त्रिगुण दरशावे । इंगला पिंगला सुखमन भावे ॥
दोहा-वौये इंगला दहिने पिंगला, मध्यसुषुम्णा नार । तापर मनपर मन निज मन है, सोई रूप हमार ॥
निज मनपर तिहासन साजा । तापर सतकबीर विराजा ॥ तहैं न काल जंजाल न व्यापा । नहिं तहैं पुन्य नहीं तहैं पापा ॥ तहां न रवि शाशिके उजियारी । एक रोम विध कोट चिकारी ॥ पांच पचीस तीन नहिं तहां । त्रिगुण न नाम कबीरसो जहां ॥ रूप स्वरूप सो निर्मल काया । अजरहिरंवर हंस रहाया ॥
दोहा-एक हंसकी शोभा, रवि शाशिको कोटन तूल । तहां सो सत्यकबीर विराजे, सब जीवनके मूल ॥ पूरण पुन्यमान जिव होई । सतकबीर कहैं सेवे सोई ॥ लखन कोट माहीं एक जीवा । सो करिहैं कबीरको पीवा ॥ जेहि होय दाम सो खाय मिठाई । मकरा घांस रंक ले खाई ॥ तैसे दाम सहज सतदाया । पूरण पुण्य सदुरु पद पाया ॥ सदुरु सत्यकबीर जिव व्याही । जीव व्याह अयरलोकलै जाही ॥
सुपथ कुपथका वर्णन व त्रिगुणी जीवका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
३१
अमरलोक सुख वराणि न जाई । छिप एक महमें गये अघाई ॥ अजर सुक चाहे जो कोई । सो सद्गुरु कवीर शिष्य होई ॥ बिना कवीर सांच कहु नाहीं । तीन लोकसो आवहि जाई ॥ सत्कवीर सो सचनिवासी । सत्यलोक अमरपुरवासी ॥ जीव दयाको जन पगु धारा । दासा तन धरि शब्दपुकारा ॥ दास कहाय प्रगट भये काशी । शिष्य कहाय रामानंद विलासी ॥ सन्यासीसे भये वैरागी । रामदत्त रामानंद अनुरागी ॥ कवीर ब्रह्म आपन जगआदा । तिन गुरु कीन्ह बाध भरजादा ॥ पाछे तब हमहूं गुरु कीन्हा । तब गुरु कीन्ह सबन भल दीन्हा ॥ रामानंद आनंद सरूपी । जन कवीर परमानंद रूपी ॥ रामानंद कला एक मोरा । सत्यकवीर समर्थ बंदीछोरा ॥ बडा नवे छोटा अभिमाना । शीतल ज्ञानकोध अज्ञाना ॥ ताते अमरपद चीन्है भाई । सुपंथ चले सो कवीर घर पाई । कछु सुपंथ कछु पंथे चाहे । सो तो रामचरणचित्त आहे ॥ झूठे लंपट चोर छिनारा । यह लक्षण रजगुण निरवारा ॥ क्रोध कपट पारसंड बढाई । यह तम गुण जीव दुखदाई ॥ सतगुण सत् कपट नहिं भावे । प्रेम भक्त गुरु दर्शन पावे ॥ गुरुदर्शन प्रभुदर्शन मानो । साधु दर्श गुरु दर्श बखानो ॥ सत्कवीर सतगुणके मूला । उनकी पटतर कोई नहिं तूला ॥ और सवे छल छुद्र समाना । रागद्वेष मान अभिमाना ॥ कहैं कृष्ण मोहि मन वच सेवे । हरदम नाम ह्यारा लेवे ॥
पाण्डव और कृष्ण संवाद
३२
कवीरकृष्णगीता ।
दया क्षमा सत गहे सो पंथा । दीन दुखी पातक भगवंता ॥ गुरु साधमहैं मोकहैं देखे । घात द्रोह तज पंथ परेखे ॥ भेटो आप मृतककी नाई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥ रहे जो पुण्य सो प्राणी । रामनाम भज वरतन जानी ॥ नरतन पाय जो भजे कबीरा । कवीर भेंट मिटे तनपीरा ॥ शिव तमगुणकी भक्तिजो करई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥ देवि भक्त चौरासी वासा । भक्त करे तन परे यम फांसा ॥ शूकर भान गिद्ध मंजारी । परे चौरासी मांस अहारी ॥ दिन रस चेटक भूत यसाना । नामभक्त बिन यमघर थाना ॥ जाहि ज्ञान जाके मन थाका । आतम परमातम पंथ ताका ॥ परआतम सब आतम कीन्हा । बिरलेआतम परमातम चीन्हा ॥ जिन चीन्हा तिन्ह सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सत्कवीर निज भेवा ॥ नारद मगन भये सुन वाणी । धन्य कवीरजो कीन्ह वखानी ॥
अर्जुनउवाच ।
अर्जुन पूछे सीस नवाई । अवलग्न हय नहीं पूछ गोसाई ॥ को कवीर कहवाते आये । जाकी ऐसी स्तुति लाये ॥ भक्त कवीर जो रहे एक तोरा । तुमते कौन बड़ा सुन मोरा ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु महिंदा । गुरु साधकर जितकर निंदा ॥ गुरुके निंदा साधुके खोटी । जुरेनसे जन वस्तर रोटी ॥ ताकर वंश होय निर्दंशा । जो साधुके निंदा परसंसा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३३
भीम वचन ।
कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥ ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥ तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥ कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥
नकुल वचन ।
कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥ सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥ दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥ द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥
कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥ जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥ चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥ इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥ सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥ तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥ धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥ फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥ जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥ संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥ करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥
कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)
३४
कबीरकृष्णगीता ।
अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥ कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥ राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥
युधिष्ठिर वचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥ जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥ तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥ पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥ और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥ तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥ तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥ जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥
कपिलमुनि वचन ।
धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥ कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥ आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥ एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥ सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥ तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥ दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥ बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३५
इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥ यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥ जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥ तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥
दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥ किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥ दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥ देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥ थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥ सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥ दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥
कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥ तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥ कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥ जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥ कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥ अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥ सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥ अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥ कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥
३६
कवीरकृष्णगीता ।
हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥ अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥ जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥ राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥ हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥ दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥ सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥ दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥ सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥ सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥ राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥ इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥ जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥ निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥ निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥ क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥ जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥ निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥ आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥ अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥