कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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नृपाति वचन ।
कहे नृप ऋषिसौ कहैं सो साँचा । राज करनको देही काँचा ॥ हम सबके संगत दिन चारा । मरनो रोर न धन वित धारा ॥ आन मरे तो रोइये भाई । मरन आप अमर रहि जाई ॥ गुरुमुख मरे रोवे नहिं भाई । साकट मरे विकल होय जाई ॥ गुरुमुख भये काल भौ नासा । साकटके गले जमको फाँसा ॥ बहुरि समुन्नत ताही नहिं रोई । दाया सतसाहेबके होई ॥ सतसाहेब सतनाथ कबीरा । तिनके हम सेवक रणधीरा ॥ हमरे साहेब यह कह दीन्हा । जीव सुये चिंता नहिं कीन्हा ॥ चिंता सोइ सुमरिये नामा । सब चिंता येटे सतधामा ॥ जो आये हमहू तन धारी । रहेन कोइ राम कृष्ण नरहारी ॥ गुरुसेवा सोई शुभ कामा । और सकल जग काम अकामा ॥ गुरु जब मिले सद्गुरु पूरा । जीव बचावे जमसो सूरा ॥ जालिम काल निरंजन बाँका । त्रिध देवा निस लावहिं आसा ॥ सबकहैं खाय निरंजन राई । बांचे सचकवीर लौलाई ॥ ऐसे संगत हमरे स्वामी । कैसे संगत कहु नृप नामी ॥ कहैं निरमोह सुनो ऋषिदेवा । उतरे पार लोग एक सेवा ॥ जो जहँके तहँवा चलि जाहीं । कोउ काहूको पूछत नाहीं ॥ आपन २ समर्थ साथा । आदनाम समर्थ सुखदाता ॥ समर्थ गुरु साधुकी सेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥ तीर्थ व्रत तप योग यज्ञधर्मा । गुरु विन मरे कालबरवंधा ॥ गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्म मरण गुरु लागिह सीठा ॥