कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु तुम धीरज धरहू । सब मिल स्तुति कबीरके करहू॥ कहैं कृष्ण सुन सुखदेव व्यासा । कहहुँ चौरासी करे विलासा ॥ डारत निरंजन शोकँह चौरासी । सच कबीर काटे जबफांसी ॥ दस चौबीस जन्म भौ मोरा । दया कीन्ह कबीर बंदी छोरा ॥ तुम सब भ्रम आये चौरासी । चौरासी दुख कहुँ संग यासी ॥ चौरासी कर लेतहिं नाथा । सुखदेव व्यास त्रसित अति जामा कहैं कृष्ण तुम काहे कंपे । सुचिछत होय धराणि किमि चंपे॥
व्यास सुखदेववचन ।
कहैं व्यास सुखदेव सुन रामा । का तुम लेहु चौरासी नामा ॥ नाम लेत चौरासी केरा । अबही कंप उठा जिव मेरा ॥ चौरासी लक्ष योनि दुखरासी । मम अरिजनसों परेउँ चौरासी ॥ चौरासीका सुनहुँ विलासा । पंछी योनि जम लावहिं फांसा ॥ लेय बझाय उखारिस पांखी । पांव टोर लेसी बस आंखी ॥ कोइ दुइ चार दिवस यह हाला । काहूकेर तुरत होय काला ॥ भूँज २ कर तेहि फिर खाई । काहु तरे काहु भूँज पकाई ॥ जाहि मार जो करे अहारा । सो तेहि मोर सौ २ बारा ॥ हभहु हारिल सुवना भयऊ । लासा लगायबझाय जमलयऊ ॥ जीवत एक २ पंख उखारेसि । जियतहिं प्राण बाज सुखडारेसि ॥ तीसर दिन जिव निकसे भाई । घर २ भिन्न जीवत कट जाई ॥ यह संक्षेप कष्ट बरणाई । सज पंछी तन भ्रमेउ भाई ॥ शीत कृष्ण सहि भवन बिहुना । पत्थर मार करे सब चूना ॥