भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

कवीरकृष्णगीता ।

३१

अमरलोक सुख वराणि न जाई । छिप एक महमें गये अघाई ॥ अजर सुक चाहे जो कोई । सो सद्गुरु कवीर शिष्य होई ॥ बिना कवीर सांच कहु नाहीं । तीन लोकसो आवहि जाई ॥ सत्कवीर सो सचनिवासी । सत्यलोक अमरपुरवासी ॥ जीव दयाको जन पगु धारा । दासा तन धरि शब्दपुकारा ॥ दास कहाय प्रगट भये काशी । शिष्य कहाय रामानंद विलासी ॥ सन्यासीसे भये वैरागी । रामदत्त रामानंद अनुरागी ॥ कवीर ब्रह्म आपन जगआदा । तिन गुरु कीन्ह बाध भरजादा ॥ पाछे तब हमहूं गुरु कीन्हा । तब गुरु कीन्ह सबन भल दीन्हा ॥ रामानंद आनंद सरूपी । जन कवीर परमानंद रूपी ॥ रामानंद कला एक मोरा । सत्यकवीर समर्थ बंदीछोरा ॥ बडा नवे छोटा अभिमाना । शीतल ज्ञानकोध अज्ञाना ॥ ताते अमरपद चीन्है भाई । सुपंथ चले सो कवीर घर पाई । कछु सुपंथ कछु पंथे चाहे । सो तो रामचरणचित्त आहे ॥ झूठे लंपट चोर छिनारा । यह लक्षण रजगुण निरवारा ॥ क्रोध कपट पारसंड बढाई । यह तम गुण जीव दुखदाई ॥ सतगुण सत् कपट नहिं भावे । प्रेम भक्त गुरु दर्शन पावे ॥ गुरुदर्शन प्रभुदर्शन मानो । साधु दर्श गुरु दर्श बखानो ॥ सत्कवीर सतगुणके मूला । उनकी पटतर कोई नहिं तूला ॥ और सवे छल छुद्र समाना । रागद्वेष मान अभिमाना ॥ कहैं कृष्ण मोहि मन वच सेवे । हरदम नाम ह्यारा लेवे ॥