भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

मर भिक्षा मह फिर तन धरई । सतनाम विन भर्षेत फिरई ॥ नरक भर्षाहिँ औ नरक निवास। भिक्षा सेज भोग कविलासा ॥ भिक्षा कीराते सूकर भयऊँ । चमकत फिरोँ नरक भष रहऊँ ॥ भयउं भान तब हाड टटोरा । भिक्षा भखी जन्म दुख झोरा ॥ एक दलिदर मोकहैं पाला । सीसलाय पालेसि योहिँ काला ॥ पुष्ट भयऊँ अहार जब बाढा । पापी भक्ष देन तब छांडा ॥ आप खाय भर पेट अघाई । शास एक योहिँ देय ललचाई ॥ खाय पेट भर उठे तब झारी । कबहुँक देय शास एक मारी ॥ ताते भान पाले मत कोई । जो पाले सो भक्ष देय सोई ॥ भक्ष नहीं देय परे अघरानी । सबयो एकै राम बरानी ॥ भयऊँ वाघतबकियेऊँतनघाता । मै नहिँ कीन्हसो कीन्ह विधाता ॥ करता काल करावे आपे । जीव श्राप हे अघ अस्थापे ॥ कर्ता काल निरंजन स्वामी । गढे भरे तन अंतरजामी ॥ जीवहिंदुखसुख बहुविधि देही । सुख किंचित दुख खान भरेही ॥ सतकवीर हैं सबके मूला । तिनके भक्त भिटे दुख शूला ॥ पुनि मै भयउं सिद्ध अघ यासी । सरे ढोर आसेउं अघरासी ॥

दोहा—और कहाँ लग बरणों, चौरासीदुख मूल ॥

सत् कबीर मिले जब, मेटे सब दुख शूल ॥ कहै कृष्ण हम नीके जाना । हमहुँ लेव कबीर प्रवाना ॥ हमहुँ पिता सो विनती कीन्हा । पान लेन कहै आज्ञा दीन्हा ॥ सतकवीर जब दाया करहीं । आपन जान मो देउ धारही ॥ यह कह उत्तर दिशि शिर नावा । नारद सुनि तब बात चलावा ॥