कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कलियुगमें तरनेका मार्ग
४६
कबीरकृष्णगीता ।
कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥ प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥ कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥ सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥ लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥ पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥ विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥ जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥ ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥ विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥ परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥ नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥ चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥ पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥ जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥ पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥ पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥ पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥ नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥ आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥ जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४७
तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥ सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥ निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥ नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥ दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥ चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥ छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥ आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥ नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥ नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥ सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥ असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥ दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥ सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥ नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥ सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥ जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥ पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥ कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥ जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥ पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥ सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥
सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न
( ४८ )
कविरक्तुणगीता ।
अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥ जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥ केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥ कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥ पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥ गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥ पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥ अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥ जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥ मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥
दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥
गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥
सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥
चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥
कविरचन ।
दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।
तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥
धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥
गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥
गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥
सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना
कवीरकृष्णगीतः ।
४९
सकलदेव वचन ।
सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥ हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥ जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥ यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥ अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥ सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥ अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥ उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥ कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥ उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥ कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥ देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥
कुबेर वचन ।
कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥ तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥ तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥
५०
कबीरकृष्णगीता ।
कबीर वचन ।
सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥ आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥ बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥ मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥ अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥ सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥ साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥ भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥ यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥ शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥ चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥ कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥ रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥ केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥ पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥ गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥ सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥ बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥ आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥ कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥
कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
५१
एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥ धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥
दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।
गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥ धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥
दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।
आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥
पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥
सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥
पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥
पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥
रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥
विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥
जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥
दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।
विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥
जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥
५२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर । आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥ अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥ हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥ रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥ निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥ निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥
कबीरवचन ।
दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास । स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥
व्यास सुखदेव वचन
कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥ यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥ कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥ दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥ वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥ सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥
दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव । सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥ तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥
मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति
कवीरकृष्णगीता ।
५३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥ अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥ रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥ पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥ रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥
दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।
एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥
गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥ गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥ भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥ जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥ शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥ पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥ निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥ अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥ अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥ कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥ आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥ दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥
गुरु और गुरुओंका वर्णन
५४
कबीरकृष्णगीता ।
तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥ आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥ जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥ जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥ देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥ असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥ बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥ वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥ वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥ पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥ द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥ कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥ करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥ ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥ धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥ बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥
दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।
यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥
काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥ एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥ छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
५५
नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥ अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥ षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥ चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥ दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥ एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥
व्यास सुखदेव वचन ।
कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥ नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥ ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥ चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥ चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥ अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥ पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥ सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥ भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥ कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥ आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥ कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥
मीन भक्षककी गतिका वर्णन
५६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥ मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥ परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥ द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥ नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥ भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४ खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥ सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥ पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥ भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥ राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥ सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥ निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥ वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥
दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।
तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥
परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥ पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥ देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥
जीव बधनेका पाप
कवीरकृष्णगीता ।
५७
यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥ छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥ कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥ कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥ कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥ अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥ सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥ जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥ कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥ कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥ कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥ कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥ जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥ मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥ जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥ बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥ सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥ सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥ सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥ सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
४
कबीरसाहबसे दर्शन देनेके लिये सब देवताओंका प्रार्थना करना
५८
कबीरकृष्णगीता ।
तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥ घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥ हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥ सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥ गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥ प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥ एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥ सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥ रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥ सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥ मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥ तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥ सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥
व्यासवचन ।
कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥ दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥ कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥
दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।
निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥
देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥
कपिलमुनिका पान परवाना लेना
कबीरकृष्णगीता ।
५९
प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥ कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥ भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥ भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥ अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥ रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥ कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥ कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥ हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥ समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥ आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥ कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥ पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥
दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद । शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥
कबीरवचन ।
सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर । श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥
कपिलमुनिवचन ।
कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥ हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥
रावणका वृत्तान्त
६०
कबीरकृष्णगीता ।
अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥ आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥ मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥ कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥ अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥ तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥ सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥ चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥ मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥ कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥ हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥ जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥ मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥ कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥ रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥ दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥ करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥ कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥ रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥
कलि युगके धर्मका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
६१
बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥ तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥ ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥ रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥ ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥ सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥ कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥
दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।
सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥
कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥ राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥ पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥ पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥ कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥ पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥ दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥ गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥
दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।
अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥
अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥ सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥
६२
कबीरकृष्णगीता ।
सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥ कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥ जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥ गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥ पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥ कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥ सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥ दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥ कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥ पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥ छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥ विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥ विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥ कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥ सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥ पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥ जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥ सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥ देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥
व्यास सुखदेव कपिल वचन ।
क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥
राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
६३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥ पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥ बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥ राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥ कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥ बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥ सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥ पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥ तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥ दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये । गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥ कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥ अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥ मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥
दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।
जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥
सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥ बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥ मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥
६४
कबीरकृष्णगीता।
मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥ व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥ कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥ कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥ हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥ नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥ नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥ और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥ गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥ करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥ ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥ गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥ अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥ सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥ ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥ यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥ सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥ निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥ जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥ करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥ सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६५
दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।
कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥
दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥
तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥
सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥
यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥
जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥
हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥
पतिव्रतावचन ।
कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥
स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥
पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥
कुंभर वचन ।
कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥
जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥
करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥
जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥
काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥
बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥
पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥
कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥