कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥ तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥ ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥ रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥ ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥ सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥ कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥
दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।
सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥
कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥ राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥ पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥ पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥ कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥ पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥ दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥ गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥
दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।
अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥
अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥ सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥