कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥ आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥ मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥ कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥ अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥ तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥ सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥ चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥ मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥ कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥ हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥ जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥ मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥ कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥ रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥ दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥ करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥ कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥ रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥