कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥ कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥ भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥ भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥ अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥ रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥ कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥ कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥ हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥ समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥ आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥ कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥ पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥
दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद । शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥
कबीरवचन ।
सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर । श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥
कपिलमुनिवचन ।
कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥ हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥