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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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( ४८ )

कविरक्तुणगीता ।

अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥ जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥ केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥ कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥ पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥ गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥ पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥ अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥ जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥ मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥

दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥

गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥

सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥

चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥

कविरचन ।

दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।

तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥

धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥

गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥

गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥