कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीतः ।
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सकलदेव वचन ।
सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥ हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥ जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥ यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥ अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥ सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥ अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥ उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥ कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥ उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥ कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥ देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥
कुबेर वचन ।
कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥ तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥ तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥