भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

कवीरकृष्णगीता ।

५७

यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥ छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥ कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥ कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥ कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥ अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥ सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥ जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥ कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥ कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥ कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥ कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥ जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥ मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥ जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥ बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥ सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥ सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥ सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥ सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥