कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥ मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥ परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥ द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥ नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥ भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४ खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥ सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥ पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥ भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥ राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥ सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥ निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥ वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥
दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।
तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥
परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥ पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥ देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥