कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥ अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥ षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥ चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥ दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥ एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥
व्यास सुखदेव वचन ।
कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥ नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥ ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥ चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥ चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥ अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥ पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥ सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥ भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥ कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥ आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥ कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥