कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥ आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥ जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥ जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥ देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥ असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥ बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥ वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥ वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥ पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥ द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥ कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥ करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥ ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥ धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥ बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥
दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।
यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥
काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥ एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥ छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥