कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
६५
दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।
कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥
दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥
तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥
सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥
यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥
जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥
हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥
पतिव्रतावचन ।
कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥
स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥
पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥
कुंभर वचन ।
कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥
जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥
करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥
जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥
काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥
बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥
पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥
कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥