कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता।
मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥ व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥ कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥ कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥ हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥ नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥ नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥ और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥ गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥ करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥ ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥ गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥ अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥ सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥ ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥ यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥ सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥ निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥ जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥ करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥ सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥