कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥ प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥ कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥ सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥ लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥ पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥ विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥ जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥ ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥ विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥ परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥ नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥ चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥ पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥ जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥ पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥ पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥ पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥ नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥ आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥ जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥