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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

५१

एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥ धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥

दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।

गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥ धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥

दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।

आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥

पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥

सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥

पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥

पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥

रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥

विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥

जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥

दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।

विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥

जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥