कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥ धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥
दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।
गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥ धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥
दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।
आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥
पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥
सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥
पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥
पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥
रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥
विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥
जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥
दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।
विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥
जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥