कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कृष्ण कबीर सम्वाद
१०४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥ सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥ तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥ नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥ कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥ जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥ दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार । करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥ कबीरवचन ।
यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥ कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥ निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥ आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥ तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥ योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥ चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥ अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥ योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥ वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०५
पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥ जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥ तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥ जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥ चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥
दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।
द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥ कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥ औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥ अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥ पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥ बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥ निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥ जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥ रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥ ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥ रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥
दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।
स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥
तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥ हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥
१०६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णु दया जब कीन्ह पुकारा । तब जानो हमरे संचारा ॥ जवहिं निरंजन विष्णु समाई । तब कर विष्णु कपट चतुराई ॥ सबपर श्रेष्ठ जानो सतनामा । कहैं कबीर गुरुपद विश्रामा ॥ गुरुसोई जो यमसो उबारे । जन्म मरण दुख दारुण तारे ॥ कहैं कबीरसो सद्गुरु जानो । राम कृष्णको स्वयं बखानो ॥
कृष्ण वचन ।
कहैं कृष्ण हम निहचे जाना । हम सब पर कबीर प्रवाना ॥ निरंजन आद सो अजर कबीरा । स्वासरूप रमै सकल शरीरा ॥ हममहैं तुममहैं सोहंग जीऊ । स्वास रूप तन जीवके पीऊ ॥ जीव सब अंश कबीरके भाई । देह निरंजन राय बनाई ॥ जो जिव लैहो कबीरके पाना । ताके डर निराकार डेराना ॥ कोटिन केर काल मोहि खावा । निराकार अज शिवहिं नचावा और जीव केहि लेखा माहीं । रहटके घरिया आवहिं जाहीं ॥
दोहा-रहटके घारिया सरगुण, रीते भर उत्तराय ।
भरी उरध भर खाली, निडर कूपके जाय ॥
जब नहिं धरती अकाश पताला । जब नहिं देह जगत कित काला नाहिं निरंजन आद भवानी । वहिं तब त्रिगुण पवन औ पानी तब नहिं दश अवतार मम भयऊ गंगा जती सती नहिं रहऊ ॥ तबकी कहैं कबीर सहिदानी । जबकी काहु मर्म न जानी ॥ कबीर बढाई हम कह दीन्हा । आप मै दास करता मोहि कीन्हा कहैं कृष्ण सुन आद कहानी । जाके आद वेद नहिं जानी ॥ निर्गुण आद पुरुष अविनाशी । कबीर कहाये प्रगट भये कासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०७
दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥
श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥
सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥
दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।
गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥
कृष्णवचन ।
कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥
तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू
और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥
सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥
सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं
निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥
कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना
जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा
हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥
जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥
गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥
१०८
कबीरकृष्णगीता ।
जासो गीत हृदय बस जीवा । अंतकाल प्राप्त सोह पीवा ॥ सबसो गीत खसस सो सेजू । सत पग हिय विषै कित तेजू ॥ मुखसो गीत सबहिं प्रभु जानी । गुप्त प्रगट पिथा व्रत चित ठानी भली छांड नहिं करिय सदाई । भली भला सुरत संतन गाई ॥ कोई मदवारे सो मदफल पावे । विजधर भे मद माद समावे ॥ दोहा-कहैं कबीर श्रीकृष्णसों, जानि छांडहु सत व्योहार ।
सत्ताहिं ते गत पाईये, झूठहिं नरकमें डार ॥ कोटिन काल निरंजन आवै । जो माहि जपै ताहि नहिं पावे ॥ युग २ नाम हमारो गावे । यम विण तोड प्रवाना पावे ॥ हर स्वांस सतनाम समावे । गगन गगन सतनाम सुहावे ॥ अघर सघर दृग दश प्रकाशा । भीतर बाहर राम निवासा ॥ यंत्र मंत्र औषध तप योगा । तीर्थ व्रत देव चंदन भोगा ॥ सबे आस तज भज गुरु साधू । कहैं कबीर सब भेर उपाधू ॥ डरे न यमसो बल कै मोरा । सुमरे नाम कबीर बंदीछोरा ॥ पूजे बोलता सब जिव राधा । मन वच कर्म सतनाम विश्रामा ॥ राधे ध्यान तो जियत तेहि भेटै । विश्वासी जियहिं अंत दुख भेटै ॥ सुन आतुर हरि साज मंगावा । नरिअर पान मिष्टान्न सुहावा ॥ सबे साज आनेउ बहुताई । घृत पकवान सुवास बसाई ॥ सकल देवतन भोजन कीन्हा । तेहि पाछे हरि वीरा लीन्हा ॥ यम विण तोर काल मुख थूँका । दीन्हो पान भेट सब चूका ॥ सतगुण देवता कोट इकादस । सनन पान लीन्हा हरि पारस ॥ रजगुण तमगुण पेल पराने । विष्णु व्यासको निंदा ठाने ॥
कबीरका अपने पन्थकी बात कृष्णसे कहना
कवीरकृष्णगीता ।
१०९
कृष्णवचन ।
यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥ जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥ कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥ सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥ तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥ जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥ कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥ जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥ दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥ सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥ जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥ जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥ अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥ धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥ दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास । हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥ जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥ पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥ तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥
११०
कबीरकृष्णगीता ।
राम कबीर कबीर सोइ रामा । अविनाशी सेज संत विश्रामा॥ सब पर दाय़ा करहु गोविन्द । एक भजुरी भक्त अनंद ॥ निरंजनके सुख टेके रहे । सत्यनामके रहनी गहे ॥ सती पतिव्रता सतपंथ सुरा । आपा भेटि मिल सर्व हजुरा ॥ राजयोग छवि गृह विश्रामा । तनसे उद्यम मनसे नामा ॥ जो जिव जपे कबीर धर्मदासा । औ जो सुरतवंश व्यालिस आसा हमरे पंथके टीका इत जागू । धर्मदासके मिल मोहे लागू ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जंबूद्वीप धर्मदासा । जागूदास वंश सुरत पास ॥ औरो कौनो दीप तुम सेवा । सो कंडहारा नाम कह देवा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर कृष्ण सहिदानी । करनाटक वंकेज बखानी ॥ दरभंगा दक्षिण चत्रभुज राऊ । सीलदेश सहने जी सुभाऊ ॥ हम सब ठौर भक्त तुव गाऊं । तुम हमरी महिमा परचारऊं ॥ अपनी महिमा आपहि लाजा । कोइ कहे हम मिथ्या काजा ॥ आपहि आप बडा किये होय पापा । गुरुकी महिमा कहि मिल आपा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण अब पायऊं जानी । एको जीव तुव गहिं अवखानी ॥ सांचे भाजिहैं सत्यकबीरा । भज कबीर ठेरे भौ पीरा ॥ दोहा-कहे कृष्ण सुन व्यास सुख, औ गऊरस सबकोय । सत्यकबीर मुक्तके दाता, सब जीवहिं गत देय ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१११
काल निरंजन बड सुख देई । जार झरकाय पापा खोय लेई ॥ धन्य विष्णु जो कछु सुखदाता । तुम सब कृष्ण कबीर विधाता ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सबहिं जिव तारों । कालहिं बांध रसातल डारों ॥ अषपत सो राजा कंहैं भावे । जो परजाहिं सुख देय न सतावे ॥ कहा करें। निज शब्द हितार्की । नातो छिनयहैं भेट देवे पापी ॥ अब याहि भला बुरा नहिं लेखा । कपुत सपूत भात पितु एका ॥ सब सुत पर पितु करे जो छोहा । निकट अबुध भक्ष देय तोहा ॥ ऐसे निरंजन हमरे वंसा । महाकाल जग घालक संसा ॥ ताते विष्णु तुम मम सिख लीन्हो । प्रगट निरंजन मम चित दीन्हो ॥ हम डर यम थरहर अब कांपे । जो मोहि मजे ताहि लख आपे ॥ कबीरके भक्त विहून जो प्राणी । ताहि काल झरकावे आनी ॥ विष्णुकी भाक्ति संपूर्ण करई । एक रोम तब यमके डरई ॥ और देवनको भक्षे काला । एकहि सत्तकबीर रसवाला ॥ सब मिल भक्ति कबीरके मानी । सत्यनाम महिमा विध आनी ॥ कहैं कृष्णसे सत्यकबीरा । मम वचन सुनहु यदुवीरा ॥ अब हम पंथ जगत विस्तारा । धर्मदास कहैं थापव कंडहारा ॥ जीवलोक कंहैं जाय हमारा । ताहि न पकड़े काल लबारा ॥ भजव जीव सकल कल लोका । सब जीवन कर मेव सोका ॥ ठीका पुन्य सती औ गंगा । सबके सत्त करे निरंजन भंगा ॥ यसि है सकल जीव धर काला । तब हम प्रगटे रूप दयाला ॥
११२
कबीरकृष्णगीता ।
गुरु सद्गुरु साधु दुखभंजन । कबीरनाम ठर डरे निरंजन ॥ कालहिं येट सकल जग तारों । आवागवन दुख सुख निवारों ॥
कृष्णव्याससुखदेवगुरुडवचन ।
कृष्ण व्यास सुखदेव खगराया । चरणटेक सब विनती लाया ॥ हम सेवकपर दाय़ा करिये । पल २ छोह हमारो धरिये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हम निकट प्रेमत । नाम भजे भौ तरे क्षमाते ॥ प्रेम बैन कहि गावे वीरा । संग सबनके स्वास शरीरा ॥ बहुर ध्यान विनति प्रकाशा । वरणहु कृष्ण चाल हरिदासा ॥ संसारी जिव कैसे तरि हैं । सत्यनाम विन भौजल परि हैं ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण जिवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥ पूर्ण पुण्य जब जीवहि होय पूरा । तबसों नाम कबीर भज सूरा ॥ कबीर नाम प्रताप बड भागी । मुक्त होय सो संत सोहागी ॥ कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥ कोट जन्म पुण्य प्रकासा । पूरण पुण्य होय सद्गुरु दासा ॥ सत्यकबीरको सद्गुरु जाना । सद्गुरु अंश मोहिं पहिंचाना ॥ हमहू सत्यनामकी आसा । वांचहि काल निरंजन फांसा ॥ जिम जगकी इसलता नहि सेवा । खातिर चटै न पाइक देवा ॥ तैसे शरण कबीर प्रतापा । होय निश्चित छूटे तिहु तापा ॥ जो लागि बनि जीवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११३
पूर्ण पुण्य होय जिव पूरा । तब जिन नाम कबीर भज सुरा ॥ कबीर नाम प्राप्त बड भागी । संत सोहागिल सो अतुरागी ॥ कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥ कोटिन जन्म पुण्य प्रकाश । पूरण पुण्य होय सदुरु दासा ॥ सत्यकबीरको सदुरु जाना । सदुरु अंश मोहिं पहिचाना ॥ हमहुं सत्यनामकी आसा । बांचहि काल निरंजन फांसा ॥ जौलग बनिज न हीरालाला । तौलग संग्रह धोधी रिसाला ॥ जौलग पारस हांथ न आवे । रती हेम दुलैभ कहैं पावे ॥ जौलग अमी वृक्ष सुध नहीं । तौलग ताड खजुरहिं खांही ॥ अस कबीर बिना सब धर्मा । कबीर बिना जिव मिटे न भर्मा ॥
गरुडवचन ।
कहैं गरुड सुन त्रिभुवन राई । तुम अंतर करेहु गोसाई ॥ तुम कबीर मिल जीव बचाहू । समय परे कस जीव नचाहू ॥ तुम यम दिशि होय बोलत अहहु । दुर्वल जीव लस दष्ट न खोलहु ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन गरुड सज्जानी । बातकी जड तुमहु नहीं जानी ॥ हम हैं निराकारके बेटा । पितु आज्ञा जाय नहीं मेटा ॥ कहा निरंजन मोहि बुझाई । चित्र गोपित्र औ जहां रिसाई ॥ कहिन केहैं निरगुण दासा । दूतन जायहु तिनके पास ॥ तिनके दास छुयेहु जिन कोई । निरगुण भक्त कबीर निज सोई ॥ कबीर प्रताप राज हम करहीं । कबीरके श्रोह किये जरि माहीं ॥ सत्यकबीर सो अलगहि जीऊ । तेहि तर लावहु कर हद धीऊ ॥
अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ अवतारका नाम
११४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनवचन ।
दोहा—कहैं निरंजन कृष्ण सुन, निर्गुण भक्तहिं छांड । निर्गुण भक्त विहून जो, ताहि नरक ले डार ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन पत्तग आसी । यह विध जीव भयें चौरासी ॥ उत्तम भक्त कबीरको आहीं । महिमा जीव विरल लखताहीं ॥ आद अनाद निरगुण कबीरा । स्वासरूप रम सकल शरीरा ॥ जब कबीर तब और न कोई । कबीरके किये सृष्टि सब होई ॥ सवते उत्तम सत्य कबीरा । तिनके निकट विष्णु धर धीरा ॥ विष्णु निकट ब्रह्मा ठहरायै । ब्रह्मा निकट रुद्र चल आयै ॥ देवी निरंजन ऊपर नीचे । सत्यकबीर न्यारा सब बीचे ॥ सत्यकबीर प्रसंग सतोगुण । सद्गुण विष्णु देव सो निरगुण ॥ निरंजन अंश ब्रह्मा मन रूपी । अर्धंगी अंस रुद्र अंधकृपी ॥ एक भाव जग बरते कैसे । ताते पृथक् २ भौ ऐसे ॥ सद्गुण बसो रजतमके माहीं । ताते विष्णु सत्य विरथाहीं ॥
दोहा—सत्यकबीरके शिष्य सुत, ताते सद्गुण विष्णु ॥
दस चौबिस विष्णु तन तामो, सृष्टि राम विष्णु । रजगुण तमगुण देह बनाई । सतोगुण अंस जिव आन समाई । रजमता अर्धंगी भवानी । तमगुण पिता निरंजन जानी ॥ सत्यकबीरके अंस सतोगुण जीऊ कहैं कृष्ण जिव सब जग पीऊ ॥
दोहा—जीव जगमें पीउ है, जीव कबीरके आहिं ।
कबीरसो आप सत्पुरुष हैं, अमरलोक रहाहिं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११५
जव जिव डेह निरंजन राई । तवै जीव रोवे चिल्लाई ॥ जाकर जीव ताहि दुख न्यापे । कबोर कहाय प्रगट प्रभु आपे ॥ जीव जरत उबारैउ कबीरा । करे भक्त जब धरे शरीरा ॥ जीवहिं धोखे परे खुलाई । सार असार चीन्ह नहिं पाई ॥ देह धरे विसरे सब ज्ञाना । देहसे न्यारा भये सब जाना ॥ जगको वेद शास्त्र अरुझावे । कबीरके भक्त नहिं विप्र हटावे ॥ कुसहा ब्राह्मण अगुवा काला । कर्मवश्य जिवपरे बिहाला ॥ दे विश्वास जो पुण्य करावे । मृतक आस जो पूर्व फल पावे ॥ जियत कर्मफल नेक न दृष्टा । पूर्वल आस मरे सो मिष्टा ॥ सौदा सोई जो दीखे दृष्टा । फल औ फूल दृष्टि सुख चिष्टा ॥
दोहा--उपजन विनसनको मता, ब्राह्मण काजी भाष । स्थिर घर जो पहुँचे जो, सत्यकबीर व्रत राख ॥ षोडश रवि शशि भाल छवि, अग्र अमी रस चाख अस सुख सत्य पुर मई, शब्द भेद मत भाष ॥
रजगुण तमगुण जोत सतंगी । सतगुण विष्णु कबीर प्रसंगी ॥ सत्य कबीरके पारस सेती । सतोषुण राम कृष्ण विष्णु केती । फिर २ जीव भ्रमें चौरासी । निरगुणको निंदक त्रिगुण उपासी धन्य एक जासो भय तीनी । माय बाप गुरुते सब चीन्ही ॥
दोहा--माय बाप गुरु सद्गुरु, साध संत द्विज एक । पवन एक बाजा बहुत, कहैं कृष्ण सत देक ।
११६
कबीरकृष्णगीता ।
विनय विष्णु जो परम सुहाई । आज्ञा करहिं कबीर गोसाईं ॥ आज्ञा सब जिव दियोसुत्काई । ऐसी करब हमसों किम भाई ॥ तात मातते गुरु अधिकार्ई । सद्गुरु शरण बिना जिव खाई ॥ बिना कबीर न वांचे भाई । कबीर साहेब सद्गुरु साईं ॥ कोटि माहिं कोई जीवमुनीता । संत साध संग पाठ कृत गीता ॥ गीतामाहिं बहु संघ कबीरा । मिले ताहि जो मथे अर्थ क्षीरा ॥ मथे क्षीर ले याखन तावे । तब घृत वास सुवास बसावे ॥ तिम कबीर सतघृत कुल वासा । और पंथ विन आसतिक आसा ॥ दोहा-वेद मथके गीता कीन्हा, गीता मथके सार ।
सार सो सार कबीर बखानहि, भाषे कृष्ण सुरार ॥
जिमि सब तनमें चक्षु नाका । तस तनमें स्वासा जिव ताका ॥ सबे कबीर कहि २ गोहरावा । तत्क्षण सत्यकबीर चलि आवा ॥ सबे कबीर घ्राणमें होतहि पहुँचै । परे सवनमें दृष्टि कबीरके ॥ थरहर उठे सबे भहराई । चरण परवार सिंघासन बैठाई ॥ चरणोदक ले विनती कीन्हा । कहँ गयउ साहेब दरश विन दीन्हा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कबीर गये जिवके खोजा । दयावंत मिले सुनीई इन सोझा ॥ दया सत् जहाँ वास हमारा । राम कबीर एक चटसारा ॥ का हिंदूका तुरक सब जाती । तारों नाम भक्त मिल पाती ॥ जात पात है त्रिगुण पसारा । विष्णु अवरण चौथे निसतारा ॥ चौथे कबीर तिनते श्रेष्ठा । सद्गुरु भक्त बिना जिव नष्टा ॥
व्यास और कृष्ण सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
११७
दोहा- विष्णु देह धर खेले, अलख निरंजन कृष्ण । सब लहुरे हैं कबीरते, राम कृष्ण शिव विष्णु ॥ गुप्त प्रगट निरगुण वो सरगुण । व्यास उक्ति मति श्रेष्ठ सो निरगुण ॥
कहैं कबीर व्यासकी बाणी । गीता मता सार सब ठानी ॥ करहु प्रकाश भागवत गीता । सुने ज्ञान जिव मिटे मन चीता ॥ हम कबीर जिव दाया ददावे । जहां सत् ताके हिं अावे ॥ सत्यकबीर हमारो नाऊं । दया सत्यके निकट रहाऊं ॥ तुम पूछेहु कव गवनेहु स्वामी । मक्का पहुँचेउ सुन नभगाभी ॥ रायअमोलिक कहैंशिष्यकीन्हा । नाम पानदे सुक कर लीन्हा ॥ जम्बुदीप धर्मदास कंडहारा । ताके अगुवा जीवन कंडहारा ॥ जागु प्रगटके जगत जगैहैं । कबीर धर्मदासके भक्त दैहैं ॥ जागू कहायब सत्यकबीरा । लहुरा कबीर जागु गंभीरा ॥ कहैं कबीर हम जगमें नासक । दासातन धर दास हो दासक ॥ सो सुनिये त्रिभुवनपति राई । कबीरधर्मदासजीवजीवतरजाई ॥
व्यासबचन ।
कहैं कृष्णसों व्यास सुजाना । जब भगवान कहो कछु ज्ञाना ॥ अगले जीवन शब्द सहाई । परख शब्द पंथ ज्ञान चलाई ॥ ऊंच नीच तन सब जिव तरई । बहुरिन योनी संकट पाई ॥ बेर अनंत पूछहु मोहिं भाई । सुकदाता कबीर ठहराई ॥ कबीरके भक्त बडे तप पावे । त्रिगुण कर्म भर्म अरुझावे ॥
साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव
११८
कबीरकृष्णगीता ।
जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥ पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥ कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥ करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥ कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥ सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥
गरुडव्यासवचन ।
गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥ कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥ स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥ तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥ धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥ और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥
कबीरवचन ।
कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥ कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥ ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥ ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥ ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥ साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥ धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
११९
बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥ सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥ अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥ सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥ केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥ तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥ एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥ औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥ अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥ तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥ गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥ गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥
दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।
तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥
करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥ ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥ मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥ जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥ नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥ आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥
१२०
कबीरकृष्णगीता ।
सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥ रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥ पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥ बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥ आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥ कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥ कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥ जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥ क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥ जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥ विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥ सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥ गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥ वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥ एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई । यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥ दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय । एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥ आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट । सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥ माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।
कबीरकृष्णगीता ।
१२१
सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज । संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥ ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥ रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता । धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥ रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत । गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥ गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास । हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥ आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव । कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥
पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥ पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥ सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥ विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥ जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥ शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥ सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥ मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥ ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥ भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥ गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥
६
१२२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।
पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥
जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥
जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥
जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥
जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥
जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥
दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।
सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥
ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।
कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥
शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।
क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥
सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।
गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥
पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।
पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥
गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।
कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥
कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।
जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१२३
गुरुआज्ञाते जो रमे, रमतें तजे शरीर । ताके सुक्त हजूर हैं, सदुरु कहें कबीर ॥ गुरुके सन्मुख जो रहे, सहे कसौटी दुःख । कहें कबीर वा दुःख पर, वारों कोटिन सुख ॥ सदुरु अधम उधारन, दयासिंधु गुरु नाम । गुरु विन कोई न तर सके, क्या जप अल्लह राम ॥ गुरु सुक्तावे जीव कहें, चौरासी बंद छोर । सुक्त प्रवाना देहिं जो, यमसो तिनका तोड़ ॥ वेद पुराण साधु गुरु, सवन कहा निज बात । गुरुते अधिक न दूसर, क्या हरि क्या पितु मात ॥ ताते शब्द विवेक कर, कीजिये सो साज ॥ जोहि विध गुरुसो प्रीत रह, कजि सोई काज ॥ गुरुसो प्रीत निवाहिये, जेहि तत निवहे संत । प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रीत निकट गुरु कंथ ॥ सोइ नाचना नाचिये, जेहि निवहे गुरुप्रेम । कहें कबीर गुरु प्रेम विन, कितहु कुशलना क्षेम ॥ तन मन सीस निछावर, दजि सरबस प्राण । कहें कबीर दुख सुख हरे, सदा रहे गलतान ॥ तब जो गुरु प्रिय बैन कहि, शिष्यहि चितवे दीठ । तो रहिये गुरु सन्मुख, कबहुं न दजि पीठ ॥ गुरु मारे झटकारे, गुरु बोरे गुरु तात । गुरुसों प्रीत निवाहिये, गुरु भौ निधि काडिहार ॥