भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

११९

बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥ सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥ अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥ सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥ केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥ तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥ एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥ औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥ अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥ तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥ गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥ गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥

दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।

तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥

करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥ ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥ मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥ जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥ नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥ आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥