भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१२०

कबीरकृष्णगीता ।

सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥ रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥ पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥ बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥ आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥ कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥ कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥ जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥ क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥ जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥ विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥ सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥ गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥ वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥ एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई । यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥ दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय । एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥ आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट । सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥ माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।