कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥
श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥
सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥
दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।
गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥
कृष्णवचन ।
कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥
तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू
और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥
सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥
सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं
निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥
कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना
जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा
हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥
जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥
गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥