कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥ जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥ तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥ जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥ चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥
दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।
द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥ कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥ औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥ अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥ पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥ बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥ निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥ जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥ रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥ ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥ रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥
दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।
स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥
तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥ हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥