भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

११४

कबीरकृष्णगीता ।

निरंजनवचन ।

दोहा—कहैं निरंजन कृष्ण सुन, निर्गुण भक्तहिं छांड । निर्गुण भक्त विहून जो, ताहि नरक ले डार ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन पत्तग आसी । यह विध जीव भयें चौरासी ॥ उत्तम भक्त कबीरको आहीं । महिमा जीव विरल लखताहीं ॥ आद अनाद निरगुण कबीरा । स्वासरूप रम सकल शरीरा ॥ जब कबीर तब और न कोई । कबीरके किये सृष्टि सब होई ॥ सवते उत्तम सत्य कबीरा । तिनके निकट विष्णु धर धीरा ॥ विष्णु निकट ब्रह्मा ठहरायै । ब्रह्मा निकट रुद्र चल आयै ॥ देवी निरंजन ऊपर नीचे । सत्यकबीर न्यारा सब बीचे ॥ सत्यकबीर प्रसंग सतोगुण । सद्गुण विष्णु देव सो निरगुण ॥ निरंजन अंश ब्रह्मा मन रूपी । अर्धंगी अंस रुद्र अंधकृपी ॥ एक भाव जग बरते कैसे । ताते पृथक् २ भौ ऐसे ॥ सद्गुण बसो रजतमके माहीं । ताते विष्णु सत्य विरथाहीं ॥

दोहा—सत्यकबीरके शिष्य सुत, ताते सद्गुण विष्णु ॥

दस चौबिस विष्णु तन तामो, सृष्टि राम विष्णु । रजगुण तमगुण देह बनाई । सतोगुण अंस जिव आन समाई । रजमता अर्धंगी भवानी । तमगुण पिता निरंजन जानी ॥ सत्यकबीरके अंस सतोगुण जीऊ कहैं कृष्ण जिव सब जग पीऊ ॥

दोहा—जीव जगमें पीउ है, जीव कबीरके आहिं ।

कबीरसो आप सत्पुरुष हैं, अमरलोक रहाहिं ॥