कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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पूर्ण पुण्य होय जिव पूरा । तब जिन नाम कबीर भज सुरा ॥ कबीर नाम प्राप्त बड भागी । संत सोहागिल सो अतुरागी ॥ कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥ कोटिन जन्म पुण्य प्रकाश । पूरण पुण्य होय सदुरु दासा ॥ सत्यकबीरको सदुरु जाना । सदुरु अंश मोहिं पहिचाना ॥ हमहुं सत्यनामकी आसा । बांचहि काल निरंजन फांसा ॥ जौलग बनिज न हीरालाला । तौलग संग्रह धोधी रिसाला ॥ जौलग पारस हांथ न आवे । रती हेम दुलैभ कहैं पावे ॥ जौलग अमी वृक्ष सुध नहीं । तौलग ताड खजुरहिं खांही ॥ अस कबीर बिना सब धर्मा । कबीर बिना जिव मिटे न भर्मा ॥
गरुडवचन ।
कहैं गरुड सुन त्रिभुवन राई । तुम अंतर करेहु गोसाई ॥ तुम कबीर मिल जीव बचाहू । समय परे कस जीव नचाहू ॥ तुम यम दिशि होय बोलत अहहु । दुर्वल जीव लस दष्ट न खोलहु ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन गरुड सज्जानी । बातकी जड तुमहु नहीं जानी ॥ हम हैं निराकारके बेटा । पितु आज्ञा जाय नहीं मेटा ॥ कहा निरंजन मोहि बुझाई । चित्र गोपित्र औ जहां रिसाई ॥ कहिन केहैं निरगुण दासा । दूतन जायहु तिनके पास ॥ तिनके दास छुयेहु जिन कोई । निरगुण भक्त कबीर निज सोई ॥ कबीर प्रताप राज हम करहीं । कबीरके श्रोह किये जरि माहीं ॥ सत्यकबीर सो अलगहि जीऊ । तेहि तर लावहु कर हद धीऊ ॥