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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।

पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥

जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥

जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥

जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥

जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥

जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥

दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।

सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥

ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।

कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥

शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।

क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥

सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।

गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥

पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।

पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥

गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।

कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥

कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।

जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥

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