भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

३५

इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥ यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥ जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥ तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥

दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥ किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥ दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥ देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥ थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥ सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥ दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥

कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥ तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥ कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥ जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥ कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥ अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥ सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥ अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥ कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥