भारतकोश
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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

रावणका वृत्तान्त

६०

कबीरकृष्णगीता ।

अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥ आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥ मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥ कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥ अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥ तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥ सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥ चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥ मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥ कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥ हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥ जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥ मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥ कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥ रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥ दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥ करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥ कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥ रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥

कलि युगके धर्मका वर्णन

कवीरकृष्णगीता ।

६१

बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥ तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥ ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥ रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥ ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥ सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥ कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥

दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।

सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥

कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥ राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥ पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥ पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥ कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥ पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥ दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥ गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥

दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।

अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥

अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥ सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥

६२

कबीरकृष्णगीता ।

सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥ कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥ जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥ गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥ पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥ कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥ सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥ दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥ कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥ पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥ छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥ विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥ विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥ कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥ सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥ पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥ जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥ सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥ देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥

व्यास सुखदेव कपिल वचन ।

क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥

राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा

कवीरकृष्णगीता ।

६३

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥ पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥ बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥ राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥ कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥ बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥ सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥ पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥ तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥ दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये । गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥ कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥ अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥ मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥

दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।

जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥

सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥ बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥ मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥

६४

कबीरकृष्णगीता।

मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥ व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥ कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥ कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥ हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥ नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥ नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥ और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥ गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥ करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥ ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥ गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥ अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥ सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥ ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥ यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥ सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥ निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥ जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥ करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥ सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६५

दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।

कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥

दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥

तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥

सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥

यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥

जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥

हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥

पतिव्रतावचन ।

कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥

स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥

पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥

कुंभर वचन ।

कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥

जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥

करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥

जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥

काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥

बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥

पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥

कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥

६६

कबीररुप्णगीता ।

जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥ जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥ दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय । कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥ स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥ पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥ जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥ दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥ ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥ “आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥ एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥ दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥ भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥ चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥ सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥ लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥ कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥ यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥ मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥ रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥ हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥ कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

६७

दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।

पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥

निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥ निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥ उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥ माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥ रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥ पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥ धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥ पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥ बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥ वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥ बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥ कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥ पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥

दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।

कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥

भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥ कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥ यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥

६८

कबीररुग्णगीता ।

भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥ नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥ जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥ गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥ बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥ तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥ सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥ पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥ कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥ सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥ बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥ सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥ पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥ परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥ कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥ यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥ परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥ कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥ कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥ यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६९

पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥ हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥ कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥ कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥ भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥ पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥ तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥ सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥ पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥ मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥ पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥

दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज । आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥

सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥ तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥ पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥ चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥ दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥ पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥ पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥ सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥

कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति

७०

कबीरकृष्णगीता ।

चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥ दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥ पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥ सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥ पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥ हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥ अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥ सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥ पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥

दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ । वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥ बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश । पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥

कबीरखचन ।

कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥ तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥ सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥

कृष्णव्यासवचन ।

विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥ सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥ कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥

अर्जुन और कबीर संवाद

कवीरकृष्णगीता

( ७१ )

अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥ जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥ तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥ कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥ अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥ हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥

कवीरवचन ।

कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥ निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥ जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर कृष्ण वचन ।

कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥ सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥ सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥ श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥ दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ। सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥

७२

कबीरकृष्णगीता ।

युधिष्ठिरकृष्णवचन ।

कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥ अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥ जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥ कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥ जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥

युधिष्ठिरवचन ।

कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥ आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥ अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥ केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥ क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥ परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥ सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥

युधिष्ठिरवचन

कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥ देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥

युधिष्ठिरका आरती चौका करना

कवीरकृष्णगीता ।

७३

कवीरवचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।

देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥

जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥

जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥

छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥

आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥

कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥

शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥

सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥

मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥

क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥

कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥

रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥

सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥

प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥

सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥

जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥

भगवानोवचन ।

कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥

सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥

एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥

कबीर साहबका युधिष्ठिरको परवाना देकर लोकको जाना

७४

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-आगे पिछे सब मिल, लियो मुक्तको पान ।

ठीका पुरे सुखघर गये, सत्यकबीर व्रत ठान ॥

सत्यकबीरके सेवक पतिव्रता । सतकबीर सब अघके हर्ता ॥ कोटि २ जिन किये अपराधा । गौ द्विज हत्या अगम अगाधा ॥ केहु प्रकारकी हत्या होई । कोट तीर्थ किये छूटे न सोई ॥ जो जिव सद्गुरु शरण सभावे । सतकबीर सुमरे सच पावे ॥ जन्म २ अघजार नसावे । यम त्रिण तोड प्रवाना पावे ॥ धन्य सराहिये ताकर भागा । जो सतनामके शरणहि लागा ॥ कहे कृष्ण सतनाम कबीरा । भेटे जीवको भौ दुख पीरा ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर हम लोकहिं जाहीं । जो सुमरे मोहिं हम तेहि पाहीं ॥ यह कह सद्गुरु गुप्तमें तहां । विष्णु व्याप्त सब स्तुति माहा ॥ सत्यनाम कहि सीस नवाई । सत्यनाम सुमरे सच पाई ॥ सत्य गहे बांचे सब कोई । सत्यनाम जप सब सुख होई ॥ सत्यनाम स्मरण सुखमूला । सत्यनाम प्रति उझे न तूला ॥ प्रतिस्वासा सुमरे सतनामा । विष्णु व्याप्त सतनाम विश्रामा ॥ महाविष्णु सतनाम अधारा । सत्यनाम ते आय निराकारा ॥ सत्यनाम सो सतपुरवासी । सतपुर अमरलोक सुखरासी ॥ विद्यावेद पढ़हिं नर लोई । सत्य अमर कहैं लखे न सोई ॥ सत्य मुक्त जाके घट पूरा । सत्यनाम तेहि रहत हजुरा ॥ सबके घट महैं अमर स्वासा । सो सतनामको अंस सुवासा ॥

निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना

कबीरकृष्णगीता ।

७५

जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥ सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥ सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥

दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥

विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥ सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥ जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥ कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥ कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥ तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥ स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥ दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥ सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥

दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।

प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥ ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥ शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥ वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥ गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥ सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥ विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥

७६

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।

सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥

अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥ कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥ गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥ दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥ आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥ जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥ जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥ पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥ चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥ वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥ तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥ नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥ सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥ निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥ बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥ नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥ नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥ अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥ दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥

कवीरकृष्णगीता ।

७७

पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥

दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।

तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥

जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥

जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा

त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥

नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥

सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥

मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥

महादेववचन ।

कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥

अष्टंगविवचन ।

उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥

मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥

एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥

हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥

ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥

विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥

हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥

जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥

भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥

७८

कबीरकृष्णगीता ।

मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥ ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥ ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥ ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥ प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥ विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥ भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥ कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥

दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।

तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥

तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥

विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥

साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥

तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥

सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥

एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥

अष्टंगीवचन ।

कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥

दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।

आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥

सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥

कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना

कबीरकृष्णगीता ।

७९

जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥ सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥ कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥ कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥

दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।

विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥ कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥

अजहरवचन ।

अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥ कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥ निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता । मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥ सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥ सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥ अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥

शिववचन ।

कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥ दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव । विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥