भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 82

६८

कबीररुग्णगीता ।

भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥ नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥ जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥ गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥ बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥ तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥ सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥ पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥ कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥ सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥ बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥ सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥ पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥ परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥ कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥ यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥ परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥ कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥ कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥ यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥