कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥
दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।
तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥
जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥
जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा
त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥
नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥
सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥
मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥
महादेववचन ।
कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥
अष्टंगविवचन ।
उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥
मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥
एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥
हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥
ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥
विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥
हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥
जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥
भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥