कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कवीरकृष्णगीता ।
७७
पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥
दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।
तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥
जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥
जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा
त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥
नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥
सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥
मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥
महादेववचन ।
कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥
अष्टंगविवचन ।
उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥
मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥
एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥
हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥
ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥
विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥
हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥
जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥
भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥
७८
कबीरकृष्णगीता ।
मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥ ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥ ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥ ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥ प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥ विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥ भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥ कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥
दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।
तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥
तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥
विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥
साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥
तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥
सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥
एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥
अष्टंगीवचन ।
कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥
दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।
आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥
सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥
कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना
कबीरकृष्णगीता ।
७९
जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥ सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥ कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥ कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥
दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।
विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥ कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥
अजहरवचन ।
अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥ कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥ निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता । मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥ सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥ सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥ अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥
शिववचन ।
कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥ दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव । विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥
८०
कबीरकृष्णगीता ।
भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥ लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥ फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥ प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥ हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥ साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥ हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥ प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥ ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥ सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।
सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥
त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥ पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।
विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥
बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥
यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥
एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥
सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
८१
जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥ तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥ तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥ कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥ सनकादिकमचन ।
कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥ तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥ सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥
दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय । अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥ सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥ रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥ बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥ तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥ तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥ छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥ गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥ परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥ सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥ कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥ कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥ सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥
सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति
८२
कबीरकृष्णगीता ।
प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥ तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥ जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥ जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥ महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥ अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥ कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥ भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥ राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥ दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर । पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥ हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥ सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥ कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥ दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥ जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥ सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥ तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥ लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥
कवीरकृष्णगीता
८३
कवीरवचन ।
कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥
निरजनवचन ।
कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥
कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥
कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥
सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥
बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥
पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥
बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥
तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥
जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥
दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।
जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।
धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥
यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥
हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥
कालवचन ।
कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥
जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥
८४
कबीरकृष्णगीता ।
बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥ तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥ निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥ जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥
दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं । कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥
सनकादिकवचन
कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥ अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥ बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥ अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥ यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥ सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥ कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥ शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥ सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥ इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८५
कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥ सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥ यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥
दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।
कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥ कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥ जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥ मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥ चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥ सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥ सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥ एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥ तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥ कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥ पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥
दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।
जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥ ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥ कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥
८६
कबीरकृष्णगीता ।
चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥ सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥ आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥ भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥ सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥ सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥ भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥ तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥ विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥ अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥
दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं । साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥ एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥ सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥ भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥ दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥ बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥ खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥ मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८७
कै प्रहापे अहि धाय विष्णु पर । सतकबीर तब कहा सुरलीधर ॥ सहस्रमुख सन्मुख कबीरा । पुन कबीर घर अमित शरीरा ॥ रूप कबीर देखत यम हारा । आपन विष भौ आपहिं छारा ॥ लीन्ह उवार विष्णुहिं सतनामा । जै कबीर कह विष्णु प्रणामा ॥ जै २ सत्यकबीर अरिघातक । काल मर्दन रक्षक सतपातक ॥ सत्यकबीर सबे गुण आगर । पतित तार देहीं सुक्त उजागर ॥ इंद्र रुद्र सब देव जिआये । सब देवन मिलस्तुति लाये ॥ सहस्रमुखी तब विष्णुहिं कीन्हा । महाविष्णुकी पदवी दीन्हा ॥ वेद विदित जाने संसारा । सहस्रसिरषा पुर्ष विचारा ॥ सहस्रसिरषापातिआनंदसिपासो । सो सतपुरुष कबीर दिखासो ॥ एक अनंतकी कौन बतावे । कोट अनंत पार नहिं पावे ॥ जाके खोजत सब पचहारे । सो सतनाम कबीर पुकारे ॥ जासु अंस एक रोम निरंजन । सो सतनाम कबीर दुखभंजन ॥ जिन प्रभु इच्छाते सब कीन्हा । सो सदुरु कबीर हर चीन्हा ॥ महाविष्णु औ विष्णु व्यासा । सत्यकबीर सुभरो हरि स्वासा ॥
दोहा—सत्यकबीरसत्यनामप्रभु, दुखनासिकासुखधाम । सर्व मई सो रम रहे, संतनमें विश्राम ॥
जहां सांच तहैं प्रगट आही । दयाहीनके निकट न जाही ॥ गुरु भक्त सबते अधिकारी । साध भक्त गुरु भक्त सुखारी ॥ कोटिन देवी देव अराधे । विन गुरु भक्त काल घर बाधे ॥ कोट अनंत कर्म संसारा । गुरुके भक्त विनसवे असारा ॥
८८
कबीरकृष्णगीता ।
इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥ गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥ गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥ विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥ सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥ जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥ एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥ तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥ सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥
दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त । विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥
जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥ पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥ निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥ विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥ कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥ जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥ सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥ बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥ कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥ तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥
अवतारोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
८९
धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥ सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥ सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥ जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥ कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥ तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥ कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥ परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥ धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥ कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥ हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥ सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥ कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥
दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।
सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥
सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥ ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥ गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥ अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥
५
९०
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज । सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥ त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥ तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥ करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥ तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥
दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप । तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥ अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥ जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥ सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥ उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥ कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥ जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥ कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥ हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥ सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥ राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥ रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९१
तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥ वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥ सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥ वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥ आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥ रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥ कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥ लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥ उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥ दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥ सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥ सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥
दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर । हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥
जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥ रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥ सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥ खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥ निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥ निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥ कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥
९२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर । भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥
व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥ नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥ कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥ कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥ भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥ युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥ रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥
दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर । सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥ जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥ कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥ हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥ कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥ निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥
गुरुभक्तिकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
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दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥
गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद
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कवीरकृष्णगीता ।
सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥ चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥ गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥ गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥ हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥ गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥
दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।
कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥ उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥ आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥ हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥ कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥ यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥ हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥ कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥
दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥
यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥ गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥
कबीरकृष्णगीता ।
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चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥ कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥ हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥ हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥ जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥ दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख । काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥
कबीर वचन ।
कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥ आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥ सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥ ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥ जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥ दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख । कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥
गुरुडवचन ।
गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥ तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥
कबीरवचन ।
श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥
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कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-शब्द हमारे शीतल, अमृत मोद सो भाव ।
भक्तपंथ समिता ज्ञान दृढ, अभे सुक्त पद लेव ॥ भले गुरुड जाय आनहु साजा । गह २ वैकुंठ वाजन बाजा ॥ कहे गुरुड भाषहु प्रभु साउज । सत्यपुरुष कह चढे सब सांउज ॥ कहे कबीर नारिअर भरपूरा । सेत गरी मिष्टान खजुरा ॥
दोहा-पान फूल चंदन सुाचि मेवा, गऊ घृत जोत प्रकाश। सो अमर प्रत नाम गुरु, चरण सतिहर दास ॥
सेत सिंहासन क्षत्र चंदेवा । ध्वजा पताका सेत सजेवा ॥ गुर मिष्टान छान जल झारी । थार जोतिधर पंच मुख वारी ॥ आज्ञा मांग गुरुड उठ धाये । तैतिस कोट देव हकराये ॥
सवा लाख नीरअर ले आना । सवा सो मन मिष्टान प्रवाना ॥ कृष्णहि नेवत दीन्ह कर जोरी । तुव प्रताप गुरु मम बंदछोरी ॥ शिव सनकादि ब्रह्मादि विष्णुवादी । देवकृष्ण सुन सुखसे सादी ॥
सब मिल आय कीन्ह धुन ध्याना । भजन अखंड शब्द प्रवाना ॥
दोहा-सकल देव मुनि चक्रित, गुरुड शरण सतनाम ।
सत्यकबीर जो सुमरे, तेहि गाढे आवे काम ॥ दीन्ह पान यम त्रिण तोराई । चरणासुत तिलक दठाई ॥ पाय प्रवाना गुरुड अनंदा । जस चकोर पाये निस चंदा ॥ महायसाद सकल मिल लीन्हा । विनवहिं गुरुड असीस तब दीन्हा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण स्वगति बढ भागी । तुम सदुरुके दास सुभागी ॥ धन्य भाग तेहि प्राणी केश । शरण कबीर गये दुख फेरा ॥